दीप धरें
निशा की उनिदी नदी,तिमिर के गांव में
बरगद की घनघोर अंधियारी छाँव में
झील की पीठ पर तमस की नाव में
झिलमिल मोतियों की सीप धरें
दीप धरें दीप धरें
अमावस की काली,रात की पीठ पर
उजास को समेटे निगोड़ी रीठ पर
अंधेरे मरुथल की नग्न भीठ पर
जगमग जुगनुओं की खीप धरें
दीप धरें दीप धरें
चिंता-सागर में डूबे प्रकाश के स्तंभ पर
मन के चौबारे में उपज आए दंभ पर
क्रोध के गलियारे में खड़े खम्भ पर
हर्षित प्राणों की कीप धरें
दीप धरें दीप धरें
*खीप- रेगिस्तान में उगने वाला एक झाड़ीदार वृक्ष
मनुष्य !
जंगल काटे
पर्वत तोड़े
अब पाट रहे नदियों को
हवा धुआंसी
आकाश मटमैला
समुद्र व्यथित पृथ्वी कंपित
फूल बचे न तितलियों को
प्रकृति क्रुद्ध है
मनुष्य!
तुम्हारी बारी आई
ध्वंस-ध्वंस खेल रहा जगत
खंड-खंड हो रही सभ्यता
विध्वंसक हुई चेतना
अनुबंधित संबंध
छल रहा समय छलियों को
सृष्टि समेट रही संरचनाएं
मनुष्य!
तुम्हारी बारी आई
ज्ञान विज्ञान से हारा
धर्म धारक से हार रहा
मृत्यु को मारने निकली थी
जिंदगी स्वयं को मार रही
मनुष्यता मंजूषाओ॔ में बंद
कालचक्र रौंद रहा
संस्कृतियों को
मनुष्य!
तुम्हारी बारी आई।
मंगल हो
रहे याद ना कुछ भी बीता
बस मधुर हो बचे ना तीता
नया साल खुशियाँ ले आए
विगत जाए अकेला रीता
अग्रिम जीवन भले दंगल हो
न रहे शनीचर बस मंगल हो
हास मुखर हो विलाप रहे न
दुख भी किसी को दास कहे न
सफलता चले नित्य साथ लग
उत्साह अडिग हो कभी ढहे न
पथ आगे चाहे दलदल हो
मंजिल पा लें इतना संबल हो
तृष्णा रहे ना क्षुधा बचे
तमस ना भयानक कथा रचे
समृद्धि सहज चढ़े आकाश
सुयश वैभव से संसार खंचे
शत्रु चाहे कठिन विषबल हो
तन मन सबका सरल संदल हो
कब खुलेगी चक्षु धृतराष्ट्र?
अब आग लगी है पानी में
डटे लोग बेईमानी में
लबादा ओढ़े बैठे श्वेत
सब कालिख भरी कहानी में
लगी दीमक यहां व्यवस्था में
नित जर्जर हो रही अवस्था में
पुर्जे ढीले छोड़ यांत्रिक
पड़ा विध्वंसक मनोवस्था में
तम बैठा दीपक के तल में
बर्फ जमी बाजुओं के बल में
शल्यक काट रहा नाखून बस
मर्ज पैठा जबकी अंतस्थल में
दिव्यांग होते जागरण में
भ्रष्टाचार लिप्त आचरण में
मिथ्याकल्पित निद्रा सखे यह
मन लगा बस है आहरण में
जब आग लगी संस्थानों में
जब उठती धुम्र उत्थानों में
सब बुझाने आते हैं राख
करके शिथिलता प्रस्थानों में
दिख रहे समाज सुधारो में
भरे दूषित रंग विचारों में
सब सिखा रहे हैं सदाचार
ख्याति जिनकी दुराचारों में
नकली घी के मिष्ठानों में
मिर्च तीखी है ज़बानों में
कब खुलेगी चक्षु धृतराष्ट्र?
दुर्योधन भरा उफानों में।
पंडित :
लिखे पढ़े जो
ग्रंथ गढ़े जो
ज्ञान बटोरे ध्यान करे जो
किताबों का सम्मान करे जो
वह पंडित है
पठन-पाठन ही जिसकी खेती
कलम है जिसकी हल कुदाल खुरपी
छेनी हथौड़ा बसुली रेती
कथा गीत गुणगान करे जो
वह पंडित है
जो मन का मनका फेर रहा है
जो मस्तिष्क को पेर रहा है
जो विधि विधान को टेर रहा है
नीति अनीति अनुमान करे जो
वह पंडित है
पंडित वह जो पथ बतलाए
पंडित वह जो जीना सीखलाए
पंडित वह जो नाड़ी पकड़े रोग बताए
दवा दारू का अनुसंधान करे जो
वह पंडित है
जो राज काज करना सिखलाए
सैनिक को लड़ना सिखलाए
व्यापारी को गुड़ा भाग गणना सिखलाए
सेवा अभिनंदित कृषि पर अभिमान करे जो
वह पंडित है
पंडित कोई धर्म संप्रदाय जाति नहीं धुन है
मन को पढ़ने मन को गढ़ने का गुन है
जो कर्म का धर्म मानवता का पाठ पढ़ाए
ज्ञान को मथ विज्ञान करे जो
वह पंडित है
गुरु वशिष्ठ विश्वामित्र द्रोणाचार्य परसुराम चाणक्य गोरख कबीर सूर तुलसी पंडित
कृष्ण बुद्ध यीशु मोहम्मद नानक पंडित
रविदास फूले गांधी अंबेडकर पंडित
जो राम सा अंतर में रमना सिखला दे
दया-दंड सुख-दुख का अंतर बतला दे
जनजीवन पर न्योछावर
भूत भविष्य वर्तमान करे जो
वह पंडित है
——
डॉ एम डी सिंह, गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश