*सुकून*
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*घर के कामों से थककर*
*उसे कभी-कभी दिन में ही*
*हल्की-फुल्की नींद आ जाती है*
*जरूरी काम होने पर भी*
*मैं उसे जगाता नहीं*
*सोता हुआ इंसान*
*मुझे कोई फरिश्ता लगता है*
*आँख खुलने पर वह कहती है-*
*अरे!आपने मुझे जगाया नहीं*
*कितना काम अभी बाकी है*
*यह कहती हुई*
*वह अपने काम में लग जाती है*
*उसकी हल्की-सी नींद*
*मुझे भारी सुकून से भर देती है।*
*पश्चाताप*
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*एक कविता*
*मेरे मन में आयी*
*काम की उलझन में फँसा*
*मैं उसे लिख नहीं पाया*
*यह सोचकर कि बाद में लिख लूँगा*
*फुर्सत होने पर*
*मैंने कविता लिखनी चाही*
*अनेक प्रयासों के बाद भी*
*कविता बन नहीं पायी*
*मनचाहा परिणाम*
*न मिल पाने के मलाल में धँसा*
*मैं हसरतों के हाथों से छूटा*
*जमीन पर पड़ा रहा*
*कभी-कभी*
*समय पर निर्णय न लेने की पीड़ा*
*पश्चाताप की परछाई बनकर*
*हमारे साथ-साथ विचरण करती है।*
■
चित नहीं लगता
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एक स्त्री ने कहा-
संसार में चित नहीं लगता
यह कहकर
वह खामोश हो गयी
यह बात उस स्त्री ने
मुझसे सदियों पूर्व कही थी
उसके बाद
अनेक सदियां आयीं और गयीं
स्त्री के चित में
कोई बदलाव नहीं आया
जैसे समाज की सोच में
स्त्री के लिए कोई परिवर्तन नहीं आया
जब भी
किसी स्त्री से मिलता हूँ
उसके बताए बगैर ही समझ जाता हूँ
संसार में
एक स्त्री का चित क्यों नहीं लगता?
रंग
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मेरे घर की खिड़की से
एक हरा पेड़
और नीला आसमान दिखता है
हरा और नीला रंग
मेरे रक्त के लाल रंग को
दुरुस्त रखते हैं।
फूलों की माला
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रंग-बिरंगे
खिले-खिले
सुवासित फूलों की माला
समय के सूर्य की तपिश से
सूख गयी
सूखने के बाद भी
देखने वाले
उसे फूलों की माला ही कहते हैं।
उजाला
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कुछ इंसान
धूप की तरह होते हैं
मिलने पर अंधकार हरते हैं
उजाला फैलाते हैं।
कुछ इंसान
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कुछ इंसानों के होने से
दुनिया कितनी सुंदर हो जाती है
कुछ इंसान
सिर्फ़ कुछ इंसान नहीं होते
पूरी दुनिया होते हैं।
गुम हुई चीजें
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चीज़ें गुम हो जाती हैं
गुम हुई चीज़ों की स्मृति
गुम नहीं होती।
अक्षर
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हम दोनों
भाषा के संयुक्त अक्षर
सदा साथ-साथ हैं
लेकिन भाषा में
संयुक्त अक्षरों का प्रयोग
कम होता है।
एक शब्द की कविता
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एक शब्द की
कविता है
माँ
सबसे छोटे शिल्प में
रची गयी
सबसे बड़ी
कविता है
माँ।
मौन
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जिसे
शब्द नहीं कह पाते
उसे
मौन कहता है।
अपने-अपने घर
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एक समय था
सब
एक घर में रहते थे
आज
सबके
अपने-अपने घर हैं।
जुनून
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कैसा जुनून सवार है
बारिश की बूँदों में
अर्श को छोड़कर
फ़र्श को चूमती हैं।
*गलत होने से बच जाता है*
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*हड़बड़ी में एक दिन*
*मैंने कमीज़ पहनी*
*और सुबह की सैर पर निकल गया*
*घर-वापसी पर*
*मेरी पाँच वर्षीय बेटी ने कहा-*
*पापा क्या आप छोटे बच्चे हो?*
*मैं उसके सवाल के अर्थ को समझकर भी*
*उसके प्रयोजन को पकड़ नहीं पाया*
*मैंने उससे पूछा*
*आप ऐसा क्यों कह रही हैं?*
*किसी होशियार बुजुर्ग की तरह*
*वह बोली-*
*आपकी शर्ट के बटन*
*छोटे बच्चों की तरह ऊपर-नीचे लगे हैं*
*क्या आपको बटन लगाना नहीं आता?*
*अपनी शर्ट के उल्टे-सीधे बटन देखकर*
*मैं छोटे बच्चों की तरह निर्दोष हँसी हँसा*
*और हँसते हुए सोचा*
*बेटियाँ होती हैं*
*तो जीवन में कितना कुछ*
*गलत होने से बच जाता है।*
*इतिहास*
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*जवान लड़का*
*बुज़ुर्ग बाप को कहता है-*
*आपको कुछ नहीं पता*
*बूढ़े हो गये हैं आप*
*लड़के का यह कथन*
*इतिहास का निषेध करता है*
*और जिसका इतिहास नहीं होता*
*उसका कोई भविष्य भी नहीं होता
*बोलना और सुनना*
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*उन्होंने कहा-*
*कितना भी बोलो*
*कोई नहीं सुनता आजकल*
*सब मनमानी करते हैं*
*हर कोई फायदे की फिसलन की ओर*
*फिसल रहा है*
*जानता हूँ*
*कि कोई नहीं सुनता*
*फिर भी बोलूँगा*
*चाहे कोई सुने,चाहे न सुने*
*कोई पेड़ तो सुनेगा*
*कोई चिड़िया तो सुनेगी*
*कोई तितली*
*कोई ततैया*
*नदी-पहाड़*
*और धरती-आसमान तो सुनेंगे*
*फिर भी*
*अगर किसी ने नहीं सुना*
*आखिर में*
*समय तो सुनेगा ही।*
*रिश्ता*
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*रिश्तों को*
*समय-समय पर*
*परिचय के पानी से सींचते रहिये*
*ध्यान की धूप लगाते रहिये*
*यदा-कदा*
*खुशियों की खाद भी जरूरी है*
*उपेक्षाओं और अंदेखेपन की*
*आंधियों से बचाते रहिये*
*रिश्ते पौधों की मानिंद होते हैं*
*ध्यान न देने पर*
*मुरझाकर*
*एक दिन सूख जाते हैं।*
*उसे जाते हुए देखना*
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*हम जल्द मिलेंगे*
*कहते हुए*
*वह विदा होती है*
*उसे जाते हुए देखता हूँ*
*कुछ दूर तक वह दिखती है*
*फिर हल्की धुंधली-सी आकृति में*
*अदृश्य हो जाती है*
*मेरे नयन*
*प्रेम-पथ में बदल जाते हैं*
*वह अनुपस्थित होकर भी*
*मेरी पलकों से होकर*
*नयनों के पथ पर चलती हुई दिखती है।*
*यूँ ही*
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*उसने फोन किया*
*व्यस्तता के कारण*
*मैं बात न कर सका*
*मैंने फोन करने का संदर्भ पूछा*
*वह बोली-*
*कोई ख़ास काम नहीं था*
*बस!यूँ ही किया*
*मैं देर तक*
*ध्यान की धूप में खड़ा*
*उसकी स्मृति की सरिता में नहाता रहा*
*कभी-कभी*
*कितना अच्छा लगता है*
*जब कोई कहता है-*
*बस!यूँ ही फोन किया।*
गुम हुई चीजों की स्मृति
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जीवन में समय-समय पर
बहुत कुछ गुम होता है
गुम हुई चीजों की स्मृति
ध्यान के द्वार पर खड़ी होकर
संवेदनाओं की साँकल खटखटाती है
उनकी खटखटाहट की आवाज़
देर तक और दूर तक गूँजती रहती है
हमारी स्मृतियों के संदूक में
उनका पहला प्राकृतिक रूप ही सुरक्षित रहता है
गुम हुई चीजें दोबारा मिलती नहीं
कभी-कभी मिल भी जाती हैं
लेकिन!उस रूप में नहीं
जिस रूप में गुम हुई थीं
उनका आकार-प्रकार
भाव-स्वभाव बदल चुका होता है
हमारा अंतर्मन
बदले रूप को स्वीकार नहीं कर पाता
हम गुम हुई चीजों की स्मृति में जीते हैं।
*फावड़ा और खेत*
*घर में पिताजी के समय का*
*एक फावड़ा है*
*अब न पिताजी हैं*
*और न ही खेत*
*आधुनिकता की आंधी में*
*सब उड़ गया*
*फावड़े को*
*जब भी देखता हूँ*
*एक अजीब-सी आत्मीयता*
*और अकुलाहट से भर जाता हूँ*
*फावड़े का घर में होना*
*पिता और खेत का*
*साथ होना लगता है।*
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*भरोसा*
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*पार्क में सुबह की सैर करते हुए*
*पेड़ से एक पत्ता टूटकर*
*मेरे कांधे पर गिरा*
*पत्ता टिका रहा*
*मेरे कांधे पर*
*मैंने उसे*
*उसकी इच्छा के विरुद्ध*
*हटाना मुनासिब नहीं समझा*
*चाहता हूँ*
*जब तक यह दुनिया रहे*
*पत्ते का भरोसा*
*बना रहे इंसान में।*
जसवीर त्यागी
प्रोफ़ेसर, हिन्दी-विभाग
राजधानी कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय
राजा गार्डन
दिल्ली-110015