– डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना
कवि राजहंस सेठ पर कुछ लिखने से पहले उनकी पारिवारिक विरासत के सन्दर्भ में लिखना निहायत ज़रूरी है। पिता स्मृतिशेष श्री भगवान दास सेठ सराफा व्यवसायी के साथ साथ साहित्य मनीशी भी रहे। ‘ गंध – सुबंध ‘ रचना पर प्रख्यात आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा का लेख और साथ में वृन्दावन लाल वर्मा , दद्दा, प्रो. भगवानदास माहौर से बैठक और मित्रता उल्लेखनीय रही. भाई श्याम सुंदर सेठ और बहन श्यामा जी का रचनात्मक अवदान सरे फेहरिस्त रहा है,उसी श्रृंखला में राजहंस जी क़ी रूचि स्वाभविक रही। परिवार क़ी रचनात्मक अभिरूचि को लेकर यह तों साफगोई से कहा जॉ सकता है की “पूरे कुए में ही भांग पडी हुई थी”।
राजहंस सेठ से मेरा परिचय दो दशक से अधिक काँ है। सुविख्यात गज़लकार जहीर कुरैशी जी के आग्रह पर वह जनवादी लेखक संघ (जलेस) क़ी गोष्ठी में आने लगे तब में जलेस का अध्यक्ष थां. 2005-06 मे उनकी छंदमुक्त कविताओं ने मुझे बहुत प्रभावित किया. गोष्ठी के अंत में जब में कविताओं समीक्षा करता तब सेठ साहब क़ी कविताओ पर मेरी त्वरित टिप्पणी क़ी बाद से हम दोस्ती से आगे आत्मीय साथी होते गए. उम्र मे बड़ा होने से थोड़ा आदर- भाव भी.
मुझे काफी समय बाद पता लगा की वह चीफ इंजी. के पद पर थे पर में ‘मास्टर’ हूँ उन्हें पता थां. दोस्ती में क्या ज़रूरत?
वह अपनी ‘एंटीक’ कार मारुंती 800 को हाई कोर्ट पर पार्क करते और लौटने पर मुझे घर तक छोड़ते. मैं कहता – “बॉस, चीफ इंजी. मास्टर को घर तक छोड़ रहा… यह हजम नहीं हो रहा !!”
उनका ठंहाका और हर बार……. वही.
लेकिन लगभग दो बरस के दरम्यान ही मासिक काव्य गोष्ठी में शिरकत करना बंद कर दिया, उनके अनुसार – दे दनादन गीत, गज़ल और नाव गीत, मुक्तक आदि का वर्चब रास नहीं आया। इसके बावज़ूद हमारी मित्रता प्रगाढ़ होती गई. वह कभी मेरे निवास पर या उनके यहा काव्य पाठ जारी रहा.
अंततः मेरी रचनात्मक क्षमता से प्रभावित होकर सेठ साहब ने स्वीकार किया कि – “ज्ञानराशि के संचित कोष काँ नाम डॉ. जी के सक्सेना है.”
इसका कारण यह था कि उनकी लगभग सभी कविताएं मैं उन्हें सुना कर उन्हें अचंभित कर देता.
राजहंस सेठ चीफ इंजी. के पद पर बेहद सख्त और दायित्व के प्रति सजग रहे। एक अलग़ तरह के वर्ग से उन्हें खड़ूस, डिक्टेटर और ह्रदय हीन के खिताब मिले तो दूसरी तरफ उनकी सालाहियत और कार्यक्षमता के आज भी कई मुरीद हैँ.
स्वाथ्य और प्रबंधन संस्थान क़ी मीटिंग में भी वह विभाग के पक्ष को निर्भीक होकर रखते। उन्होंने मुझे बताया किया मीटिंग ख़त्म होने पर वह सुपरिचित समकालीन कवि पवन करण के कक्ष में बैठ कर साहित्यिक गपशप का सिलसिला निरंतर चलता रहा। मैंने उन्हें बहुत समझाया बशीर बद्र साहिब के एक शेर में “लोगों” क़ी जगह “कवियों” लिख कर सावधान भी किया .
” बड़े कवियों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता ”
उन्होंने मेरी चेतावनी नहीं मानी. आगे फेसबुक और पत्र – पत्रिकाओं में उनकी कविताओं ने बहुत विल पाठक वर्ग को बेहद प्रभावित भी किया.
ग्वालियर मे राजहंस सेठ ‘घर के जोगी’ नहीं है. उनके प्रशंसक बहुत हैँ. इनमें सरे फेहरिस्त आईटीएम के संरक्षक और साहित्य, संगीत और कला के मर्मग्य रमाशंकर जी है. वह न केवल उनका काव्य पाठ कराते हैँ, स्थापित कवियों से उनका परिचय भी कराते है.
अशोक वाजपेई से कुछ विशेष अपेक्षा सहित बैठक कराई…… “कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी यूंही कोई…… ”
और सेठ साहब बकोल दुष्यंत –
“हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया
हम पर किसी खुदा क़ी इनायत नहीं रही…”
राजहंस सेठ की सृजनातमक यात्रा के साथी, मित्र और रचमाकारों में ( वरीयता न देखें )
नरेश सक्सेना, देवेंद्र आर्य, कात्यायनीं, पलाश सुरजन, संजय लकड़े, संध्या टिकेकर ( राजहंस जी की मराठी में अनुवादित कविता संग्रह), अनिल करमेले, पंकज दीक्षित ( दोनों के कई कविता पोस्टर ), हरीश पाठक, पवन करण, भारत यादव, कुंदन सिद्धार्थ, भानू प्रकाश रघुवंशी, इंद्रा राठौर, जसपाल बांगा, हरगोबिंद पुरी, रमाशंकर जी, नन्द लाल जी, देवेंद्र सुरजन, सीमा अनिल सहगल, रश्मि सबा, नेहा नरुका, दिनेश अत्रि आदि आदि… और मैं भी.
(उम्मीद है यह सूचीअप्रासगिक नहीं लगेगी )
और अंत में इस स्वभाव से अक्खड़ और तबियत से मस्त कवि की मेरी चयनित कविताओं पर संक्षिप्त टीप (विशद आलोचना बाद में)
सेठ अक्खड़ इसलिए कि मुद्रा राक्षस देकर काव्य संग्रह नहीं छपाएंगे. दो दशक की ज़िद पर अड़े हैँ.
मैंने उनकी कविताओं को तीन “प्र” में विभाजित किया.
1. प्रकृति
2. प्रेम
3. प्रतिरोध (प्रतिकार)
आगे विस्तार से अभी कुछ कविताएं’
” पेड़ों के अपने दुःख – सुख होते हैँ. ”
” ज़ूड़ा ”
कहते है
स्त्रियाँ अपने दुखों को
जूड़े में बाँध लेती हैँ.
” पिता काँ कमरा ”
” लो सब से सारा नृमांड तुम्हारा है. ”
” राजा नंगा है. ”
” तानाशाह ”
” जिन्हे सच के साथ लड़ना थां
वे झूठ के साथ खड़े हो गए. ”
, “” गटर काँ लड़का गटर में हीँ जाएगा. ”
” देह पर लजाती है स्त्रियाँ. ”
” जाने से पहले
नष्ट कर जाऊंगा अपनी डायरी. ”
कबीर ने कहा –
” मसि कागद तो छुआ नहीं. ”
और इस अक्ख़ड़ कवि ने बिना किताब छुए ( छपवाए ) अपनी कवताओं से अलख तो जगा ही रहा है. और जगाता भी रहेगा.
हम दुःख दर्द साझा करते रहते है, हमारी दोस्ती पर शिफ़ाई का यह शेर …..
“ये मौजेज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे,
कि संग तुझ पे गिरे और ज़ख़्म आएँ मुझे।”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश।