– डॉ. देवेन्द्र कुमार भल्ला
– लहक डिजिटल में प्रकाशित, 18 मई 2026
(सामान्य परिचय)
(सामान्य परिचय)
दिल्ली निवासी कवि राकेश भारतीय की इस संग्रह की सात कविताओं में एक ऐसा स्वर सुनाई देता है जो एक साथ अंतरंग भी है और सामाजिक सरोकारों से भरा भी। यह संग्रह व्यक्तिगत और राजनीतिक के बीच, भीतरी जीवन की मूक पीड़ा और सार्वजनिक जीवन की ऊँची-ऊँची विसंगतियों के बीच सहजता से आवाजाही करता है। इन सातों कविताओं को एक सूत्र में पिरोती है एक निरंतर भावनात्मक ईमानदारी — न सुख का दिखावा, न आक्रोश का प्रदर्शन।
विषय-वस्तु और विचार
इस संग्रह का विषयगत विस्तार प्रशंसनीय है। तीन कविताएँ — घर मेरा नहीं, उदासी की कोठरी, और यादों का घड़ा — मिलकर एक प्रकार की आंतरिक त्रयी रचती हैं। ये कविताएँ उस अजनबीपन को व्यक्त करती हैं जो एक व्यक्ति अपने ही घर में महसूस कर सकता है; उस गुप्त उदासी को जो हर हँसमुख व्यक्ति अपने भीतर छुपाए चलता है; और उन दफ़न यादों की ओर बार-बार लौट जाने की उस बाध्यता को जो अक्सर पीड़ादायक होती है। ये केवल व्यक्तिगत स्वीकारोक्तियाँ नहीं हैं — ये एक सार्वभौमिक मानवीय अनुभव को वाणी देती हैं, और यही सार्वभौमिकता इन्हें गहराई प्रदान करती है।
उम्र के इस मोड़ पर उम्र बढ़ने और क्षय होते जाने पर एक गहन चिंतन है — नाटकीय नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जमा होने वाली उस टूट का — लोगों की, पहचान की, परिचित परिवेश की। इसमें उस व्यक्ति का गाम्भीर्य है जिसने अपने जीवन का ईमानदारी से लेखा-जोखा किया हो और नज़र चुराने से इनकार कर दिया हो।
शेष तीन कविताएँ — खेला चुनाव का, मुहब्बत के लिए नाकाबिल शहर, और जाति न पूछे कोय — कवि की बाहरी दृष्टि हैं, समाज पर तीखी और विचारशील नज़र। चुनाव वाली कविता व्यंग्य की धार से लोकतंत्र के मिथक को चीरती है। शहर वाली कविता उन लेन-देनी, जातिवादी और सांप्रदायिक छन्नियों को उघाड़ती है जिनसे आज का भारतीय प्रेम जैसे मानवीय भाव को भी छानकर देखता है। जाति वाली कविता, शीर्षक और आत्मा में कबीर और रैदास की भक्ति परंपरा की गूँज लिए, एक शक्तिशाली कल्पना के सहारे अपनी बात कहती है — यदि तुम जन्म के बाद किसी और बिरादरी में पले-बढ़े होते, तो विज्ञान का कौन-सा उपकरण तुम्हारी “असली” जाति बता सकता था? यह इस संग्रह की सर्वाधिक दार्शनिक दृष्टि से समृद्ध कविता है।
अभिव्यक्ति
भारतीय की सबसे बड़ी शक्ति है उनकी सीधी-सादी बात कहने की क्षमता। वे अपने विषयों के पास घुमावदार रास्ते से नहीं जाते, न ही किसी गहन दार्शनिक अस्पष्टता की आड़ लेते हैं। फिर भी वे नीरस नहीं हैं। उनके बिंब सटीक और यादगार हैं — उदासी वाली कविता की “गठरियाँ” जो एकांत में खोली जाती हैं और दुनिया में लौटने से पहले चुपचाप बाँध ली जाती हैं; “यादों का घड़ा” जो हर बार खोदने पर लहूलुहान करता है; घर मेरा नहीं का आईना जिसमें कवि तसल्ली ढूँढता है पर दूसरों की आँखों की जाँच-पड़ताल पाता है।
चुनाव वाली कविता में गिरगिट का बिंब — जो रंगहीन ज़िंदगियों के सामने रंग-बिरंगे वादे लेकर आता है — विशेष रूप से सजीव और संक्षिप्त है। इसी प्रकार शहर वाली कविता का अंतिम शेर — कवि का कभी न लौटने के लिए उठ जाना — में एक शांत, गरिमामय अंतिमता है जो किसी भी चीख-पुकार से अधिक असर करती है।
भाषा और शैली
भारतीय एक बोलचाल की किंतु सुचिंतित हिंदी-उर्दू में लिखते हैं, जिसमें खड़ी बोली और उत्तर भारत की गली-कूचे तथा बैठकखाने में बोली जाने वाली हिंदुस्तानी दोनों का स्वाभाविक मेल है। मायूस, नाकाबिल, बाशिन्दे, नस्ल, मज़हब जैसे शब्द विशुद्ध हिंदी अभिव्यक्तियों के साथ सहज बैठते हैं और एक ऐसी भाषा बनाते हैं जो शहरी पाठक को स्वाभाविक लगती है, बनावटी नहीं।
उनकी शैली आत्मकथात्मक कविताओं में संवादी और अतुकांत है, किंतु सामाजिक कविताओं में वे एक ढीली-ढाली, लोकगीत-सी लय अपना लेते हैं। चुनाव वाली कविता में विशेष रूप से एक मौखिक गुण है — उसके दोहराव (पैदल-पैदल, बदल-बदल, घूर-घूरकर) उसे नुक्कड़ नाटक में पाठ के योग्य बनाते हैं। यह स्वर-लचीलापन — अंतर्मुखी चिंतन से लोक-व्यंग्य तक — एक परिपक्व काव्य-संवेदना की निशानी है।
टेक की तकनीक, जो घर मेरा नहीं, उम्र के इस मोड़ पर, और यादों का घड़ा में प्रभावी ढंग से प्रयुक्त हुई है, उन कविताओं को एक वृत्ताकार, लगभग संगीतात्मक गुण देती है — यह संकेत करती है कि वर्णित भावनात्मक अवस्था का कोई सरल निकास नहीं, वह बस वहीं लौट आती है।
निष्कर्ष
राकेश भारतीय एक ऐसे कवि हैं जिनके यहाँ भावनात्मक स्पष्टता और सामाजिक चेतना साथ-साथ चलती हैं। यहाँ प्रकाशित उनकी सात कविताएँ एक छोटी किंतु सुगठित दुनिया रचती हैं — एक ऐसी दुनिया जिसमें एकांत और व्यंग्य साथ रहते हैं, निजी दुःख और सार्वजनिक आलोचना एक ही साँस में उठती हैं, और जहाँ द्वारका के एक डीडीए फ्लैट में रहने वाला एक कवि अपने भीतर व्यक्तिगत स्मृतियों का बोझ और एक बेचैन नागरिक की साफ़, असंतुष्ट दृष्टि एक साथ वहन करता है। यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता की सर्वाधिक सुलभ और ईमानदार धारा की जीवंतता का प्रमाण है।
लहक डिजिटल इस तरह की रचनाओं को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के लिए साधुवाद का पात्र है।
राकेश भारतीय की सात कविताएँ
घर मेरा नहीं
उस घर को अपना मानने से डरता हूँ
घर जिसमें मैं आजकल रहा करता हूँ
मुझे जो अच्छा लगता है वो दूसरों को नहीं
अच्छा जो उन्हें लगता है, मुझे समझ में आता नहीं
कि किसी दूसरे ही घर में घुसने का भरम होता है
फिर-फिर दरवाजों और खिड़कियों को देखकर
तसल्ली करना चाहता हूँ कि वही घर तो है ये
तो घर की हवा का अजनबीपन महसूस करता हूँ
बहुत अफनाहट हो जाने पर अपने को आईने में
बरसों पहले से घर में मौजूद मेरे ही आईने में
फिर-फिर देखता हुआ फिर तसल्ली करना चाहता हूँ
पर तभी घर में मौजूद बाकी आँखों का बहुत
घूर-घूरकर मुझे आईना सा दिखाना सहता हूँ
इसीलिए उस घर को अपना मानने से डरता हूँ
घर जिसमें मैं आजकल रहा करता हूँ।
***
खेला चुनाव का
है बजा बिगुल चुनाव का, सक्रिय हो गये हैं दल के दल
किसी के पास धन का बल तो किसी के पास है बाहुबल
कुछ ही हफ्तों में बटनदबाऊ वोट-मशीन पर नपेगा बलाबल
कोई कहे महा-झूठा है वो दल, कोई चिल्लाये बड़का चोर ये दल
बीच-बीच में दलबदल कर रहे देते हैं बयान खूब बदल-बदल
कार पर ही चलनेवाले वोट मांगने जाते अब पैदल-पैदल
जींस-टीशर्ट में जो सदा सुसज्जित घूमें अब पजामे-कुर्ते में भेस बदल
जो चढ़े रंग चुनाव का तो चढ़ न पाये कोई भी दूजा रंग
बेरंग ज़िंदगीवालों के सामने गिड़गिड़ायें गिरगिट वादे लेकर रंगारंग
मार भकुवाय-चकराय वोटर देखे जायें ये तमाशा चुनाव का
चंद दिनों की बात-बहार के बाद जीवन वही रहेगा, ठहराव का
पोथी पढ़-पढ़कर ज्ञानी भये टेरे जायें गुण पर गुण इस लोकतंत्र के
जिसमें चुनाव के रास्ते तंत्र होगा ही सवार बेचारे लोक के सिर पे
आओ भैया, आओ बहिनी बटन दबाकर सफल करो ये चुनावी खेला
खेला जिसमें तंत्र पर काबिज हो जायेगा कोई सयाना, तुम्हें न मिलेगा धेला।
***
उदासी की कोठरी
चाहता नहीं हूँ मगर न चाहते हुए भी मैं कभी-कभी
अपनी उदासी की कोठरी में जाकर चुप बैठ जाता हूँ
खोलता हूँ वहाँ बैठकर एक के बाद एक सारी गठरियाँ
छूटे हुए लोगों से लेकर टूटे हुए रिश्तों की गठरियाँ
अधूरे रह गए सपनों की गठरियाँ ,पराये बने अपनों की गठरियाँ
फिर बिसूर लेता हूँ जब घंटों-घंटों गठरियाँ खोले हुए
तो चुपचाप गठरियाँ वापस बाँधकर बाहर निकल आता हूँ
बाहर किसी को पता ही नहीं उस कोठरी के बारे में
बड़ा हँसमुख और ज़िंदादिल है, कहते हैं वे मेरे बारे में
अब पता चलेगा भी कैसे उस कोठरी का किसी को
मैं ही तो ताला खोलता हूँ उसका, मैं ही तो बंद करके आता हूँ।
***
उम्र के इस मोड़ पर
कितना कुछ खो चुका हूँ,कितना कुछ और खोना बाक़ी है
उम्र के इस मोड़ पर बस यही एक हिसाब बाकी है
खो चुके में शामिल इन्सान, पहचान, मकान-दुकान
एक वक़्त बहुत ही प्रिय रहा वो ज़िंदगी का सारा सामान
याद कर-कर गिनने लगता हूँ तो सही हिसाब मिलता नहीं
हिसाब मिल जाये भी तो उसे हिसाब मानने का जी करता नहीं
ये खोये हुओं का ही हिसाब दिल पर इतना ज्यादा भारी है
कि और कुछ खो सकने का ख़याल कर पाना ही दुश्वारी है
फिर भी खोना पड़ेगा ही जो कुछ और खोना अभी बाक़ी है
उम्र के इस मोड़ पर बस यही एक हिसाब बाक़ी है।
***
मुहब्बत के लिए नाकाबिल शहर
मुहब्बतें लेकर आया था इस शहर में पर मायूस होकर बैठा हूँ
अपनी झोली मुहब्बतों की वैसी की वैसी लिये हुए बैठा हूँ
मुहब्बत करने से पहले लोग यहाँ हमारा नाम जानना चाहते हैं
नाम बताने के बाद गाँठ में है कितना दाम ये भी जानना चाहते हैं
नाम-दाम से काम चल जाता तो भी ग़नीमत समझ लेता मैं
पर यहाँ तो बाशिन्दे नस्ल और मज़हब का तामझाम भी जानना चाहते हैं
इतना सोच-सोचकर जो मुहब्बत करने के बारे में सोचा करे
उसे तो हम जैसे सिरे से मुहब्बत के लिए नाकाबिल मानते हैं
यही मेरी मायूसी का सबब है , इसी मायूसी के साथ अब उठते हैं
कभी न वापस आने के लिए अब इस शहर से हम उठते हैं।
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जाति न पूछे कोय
जाति को कपार पर चिपकाये चलने से जाति नहीं जाती
दिलो-दिमाग़ से निकाल बाहर फेंकने पर ही है जाती
कबीर, रैदास का रट्टा मारने से बिलकुल नहीं जाती
उनके पदों की बातों पर अमल करने से ही है जाती
नेता-शेता के भोंपुओं पर कान बिलकुल न लगाओ
बाबा-शाबा के प्रवचनों के भुलावे में भी न आओ
दिन में तो उनकी ज़बान सबका समान होना बताती
रात को उन्हीं के सीने से जाति चिपकी नज़र आती
बस अपने से ही पूछो एक सवाल पूरी ईमानदारी से
पैदा होते ही तुम्हारी माँ अगर तुम्हें जंगल में फेंक आती
वहीं किसी और बिरादरी में तुम्हारी परवरिश हो जाती
तो साइंस के किस उपकरण या किसी ख़ास टेस्ट से ही
किस जाति के असल में हो तुम, ये बात तय की जाती?
सदियों से ढोये जा रहे इस बोझ को अब उतार फेंको
बदलती जा रही बड़ी दुनिया से अपनी पहचान जोड़ो
बड़ी दुनिया में ये कूपमण्डूकी पहचान पहचानी नहीं जाती
किसमें दम है कितना, बस यही एक बात है मानी जाती।
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यादों का घड़ा
घूम-फिरकर वहीं फिर-फिर पहुँचना होता है
जहाँ अपनी यादों का घड़ा गड़ा होता है
पहले ही लहूलुहान हुए हाथों से खोद-खोदकर
निकालते हुए हाथ और लहूलुहान होता ही होता है
घड़ा निकाल कर उसके मुँह में हाथ डालते ही
जैसे कोई पुराना साँप नये फन से डँसता होता है
न यादों से पिंड छूटता है न उन तक पहुँचने की चाहत से
चेतन-अवचेतन में आदतन जैसे ये होता ही होता है
घूम-फिरकर वहीं फिर-फिर पहुँचना होता है
जहाँ अपनी यादों का घड़ा गड़ा होता है।
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पता – 590, डी.डी.ए. फ्लैट्स, पाकेट-1, सेक्टर-22, द्वारका, नई दिल्ली-110077
फोन–09968334756, ईमेल – bhartiyar@ymail.com
परिचय
डॉ. देवेन्द्र कुमार भल्ला
डॉ. देवेन्द्र कुमार भल्ला, भारतीय प्रशासनिक सेवा (1986 बैच, नागालैंड कैडर) के एक विशिष्ट अधिकारी रहे हैं। लोक सभा सचिवालय में सचिव तथा नागालैंड सरकार में सलाहकार जैसे उच्च पदों पर आसीन रहते हुए भी उनके भीतर का साहित्यकार सदा जागृत रहा।
पूर्वोत्तर भारत, कश्मीर, भू-राजनीति और आर्थिक विमर्श पर उनके आलेख नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों में समान रूप से आदृत हैं। संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, मराठी और गुजराती पर समान अधिकार रखने वाले डॉ. भल्ला की भाषा में गुलज़ार-सी काव्यात्मकता और गहन संवेदना सहज ही परिलक्षित होती है।
उनकी सर्वाधिक विशिष्ट प्रतिभा है — दूसरों की रचनाओं की आलोचनात्मक सराहना। वे किसी कृति की बाह्य सज्जा पर नहीं रुकते, उसकी अन्तरात्मा में उतरकर उसके सृजन-सौन्दर्य को उजागर करते हैं। उनकी समीक्षा में पैनापन भी है और स्नेह भी — यही कारण है कि रचनाकार उनकी टिप्पणी को दण्ड नहीं, वरदान मानते हैं।
डॉ. भल्ला उन विरल प्रशासक-साहित्यकारों में हैं जिनके लिए लेखन आत्म-अभिव्यक्ति और परस्पर-संवर्धन का पवित्र माध्यम है।