तलाशिए
लगी नहीं हो कहीं आग तो माचिस तलाशिए
रहने नहीं दे जो चैन से खारिश तलाशिए
गर मचते ना दिख रही हो खलबली लोगों में
जज्ब जरूर है उनमें कोई साजिश तलाशिए
नहीं होना यूं भी ठीक कि बंटे रेज़ा-रेज़ा
नजरों में न जो समाए वो गारिश तलाशिए
कसीदे और नहीं पढ़िए जूते की शान में
मनमाफिक जो उसे बदल दे पालिश तलाशिए
नहीं खत्म होगी गर्मी करने से घरों को ठंडा
ढक जो सूरज को भी जाए बारिश तलाशिए
खारिश-खुजली, जज्ब-घुला होना
रेज़ा-रेज़ा – तिनका-तिनका
गारिश- तेज चमकदार तीखा रंग
कसीदे पढ़ना- शायरी में प्रसंशा के गीत गाना
खामोशियां
रोशनदान बंद हो रहे सूरज खामोश है
लेकर छत से रोशनी आदमी खामोश है
कट रहे थे पेड़ तब भी सूरज खामोश था
जल रहे हैं घर अब भी सूरज खामोश है
खत्म पानी, प्यास से कौवे तरुवर मर रहे
इंसान से ही पूछिए नदी तो खामोश हैं
प्रकृति की प्यास बोतल-पानी से मिटा सको
तब कहूं हो दमदार संसार तो खामोश है
लाकर हवा फेफड़ों में धूल-धुआं भर गई
पूछिए अपने मन से खड़ा क्यों खामोश है
मिट्टी में उगती नहीं दूब है नाराज क्यों
आदमी भी चुप आज धरती भी खामोश है
भोजपुरी ग़ज़लें
अजबै-गजबै खेला
बूझत रहल मूड़ प गीरी तबो लोकवलस ढेला
सांच कहा ए मोर भइया कइलस खिलाड़ी खेला
मेहरारू मुंह गोरहर खातिन माहुर लिहें पोत
लाज करिहैं घरे में,नचिहैं लगा के बहरा मेला
कान्ह लंगोट टांग घूमै ऊ खाला दावं पछाड़ी
जे बग्घी-बग्घी करै दिन भर लेके आवे ठेला
गरिआवेला पोंछ दबा के भागत लामे कुकुरा
छोकरी गुरुआइन क सुग्घर ले भागेला चेला
ना बोली कहिआ ले हो रंगल सिआर हुआं
खेली हो कहिआ ले चाईं संगही बइठ गदेला
जब्बर चोर
कुक्कुर अस गुर्राता बबुआ उरुआ अस गुरेरत बा
बगुला अइसन घात लगवलस बघेला अस घेरत बा
का होई ए मोर कक्का कुछ करा जुगत कि जान बचे
छील-छाल के अपनै बतिआ ऊंखी अइसन पेरत बा
तेल-ताल छोड़ा बाबू रही जान त देखल जाई
जब्बर चोर अस ऊ त दादा घूंचा-घूंची हेरत बा
लीखि पकड़ि के कहिआ ले ई डुगुरी गाड़ी जिनगी क
सोकना बरधा पोंकत बा धवरा बरधा छेरत बा
बेचुनले परधान भइल, चढ़ल बा छाती डकइत अस
बात-बात में गरिआवत हऽ बाति-बाति मे रेरत बा
जब्बर- ढींठ बलशाली, उरुआ-उल्लू, गुरेरना- आंख दिखाना, घूंचा-घूंची- घी वाले मिट्टी के बड़े छोटे बर्तन, लीखि- बैल गाड़ियों के पहिए के लिए बनाए गए पतले रास्ते, सोकना- मटमैला, बरध- बैल, पोंकना- पानी की तरह पतली टट्टी होना, धवरा- सफेद, छेरना- टट्टी करते समय भोजन बाहर निकलना जो चारों तरफ छिट जाता हो, रेरना- सीधे मुंह बात ना करना ।
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डाॅ.एम डी सिंह, गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश