हिन्दी पत्रकारिता ने स्वतन्त्रता के पूर्व से ले कर वर्तमान समय तक कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और तब से ले कर अब तक हिन्दी-पत्रकारिता की इस यात्रा में कई परिवर्तन भी आए हैं। परिवर्तन सदैव ही सकारात्मक हो यह आवशयक नहीं हैं। अनेक बार परिवर्तन अपने साथ कुछ ऐसी चुनौतियाँ ले आता है जिससे यात्राएं कठिन हो जाती हैं या उन्हें संशय से देखा जाता है। इस क्रम में हिन्दी पत्रकारिता में भी अनेक परिवर्तन आयें हैं लेकिन कहीं न कहीं हिन्दी-पत्रकारिता वर्तमान में भीतर ही भीतर दरक भी रहीं हैं। हालांकि समय के साथ पत्रकारिता अपने आप में ही एक महत्वपूर्ण विधा बनती गईं इसलिए इसे लोकतन्त्र के विचारों का दर्पण भी कहा जाता हैं। इसी के साथ अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुये भारतीय लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ भी कहलाई। अपनी इस विकास यात्रा के दौरान पत्रकारिता समय-समय पर बाधाओं और प्रतिकूल परिस्थितियों को मात देते हुये आगे ही बढ़ रही हैं।
आज 30 मई 2023 का यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘भारतीय हिन्दी पत्रकारिता’ इस वर्ष अपने 197 वर्ष पूर्ण कर लेगी, जो कि अपने आप में ही भारतीय पत्रकारिता के लिए गौरव का विषय है। यहाँ उल्लेखनीय है कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में समाचार पत्र ‘‘उदन्त मार्तण्ड’’ हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र, 30 मई 1826 को कलकत्ता से साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित हुआ था और इसका प्रकाशन जुगल किशोर शुक्ल द्वारा किया गया था जो केवल प्रत्येक मंगलवार को ही प्रकाशित होता था।
हालांकि वर्ष 1820 में भी उर्दू, बांग्ला, मराठी के साथ ही और भी अन्य भाषाओं में कुछ थोड़े-बहुत पत्र प्रकाशित हुआ करते थे लेकिन ‘उदन्त मार्तण्ड’ को ही हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र होने का गौरव प्राप्त है लेकिन अंग्रेजी-सत्ता के प्रतिबंधों के कारण अंततः यह समाचार पत्र 4 दिसंबर वर्ष 1827 को बंद हो गया।
थोड़ा पीछे जाए या इतिहास को टटोले तो पत्रकारिता नि:संदेह आज की तरह इतनी आसान नहीं थी।
यह वह समय था जब अंग्रेज शासन के विरोध में कई पत्र-पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों ने बड़ी हिम्मत दिखाई और लगातार अपनी आज़ादी के लिए कलम चलाते रहें और अंग्रेजों का विरोध करते रहें। इस समय वर्ष 1920 से वर्ष 1947 तक के अधिकांश समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ आज़ादी के आंदोलन के महत्वपूर्ण साक्षी रहें। इनमें राजा शिवप्रसाद के नेतृत्व में वर्ष 1845 में काशी से हिन्दी पत्र ‘बनारस अखबार’, जिसके संपाद्क गोविन्द रघुनाथ थे, वर्ष 1854 में कलकत्ता से हिन्दी का पहला दैनिक समाचार पत्र ‘समाचार सुधावर्षण’ जिसके संपादक बाबू श्याम सुंदर सेन थे, 17 जनवरी 1920 को ‘‘कर्मवीर’’ का प्रकाशन जबलपुर से माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में हुआ, यह सभी भारत की आज़ादी के लिए सदैव ही तत्पर रहें।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र के संपादन में काशी से ‘कविवचनसुधा’, वर्ष 1907 में मालवीय जी के संपादन में इलाहाबाद से ‘अभ्युदय’, वर्ष 1910 कृष्णकांत मालवीय द्वारा में हिन्दी-पत्र ‘मर्यादा मासिक’, वर्ष 1913 में खण्डवा से माखनलाल चतुर्वेदीके संपादन में ‘प्रभा’ और वर्ष 1909 में बनारस से अंबिका प्रसाद गुप्ता द्वारा ‘इंदु काशी’ जैसे प्रकाशन भी अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास को देखा जाए तो उस समय पत्रकारिता के सामने कई चुनौतियाँ थी क्योंकि अङ्ग्रेज़ी शासन काल में हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ निकालना आसान नहीं था। इसलिए पत्रकारिता कुछ अधिक मुखरित नहीं हो पा रहीं थी। अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों ने पत्रकारिता के पाँव जकड़ कर रखे थे। इसके पश्चात भी उस समय के कुछ स्वतन्त्रता सेनानी छुप-छुपाकर अपनी बात जनता तक पहुँचाते ही थे और वह भी बड़े स्पष्टवादिता और मुखर अंदाज में, बिना किसी लाग-लपेट के और निर्भय हो कर। भारतीय हिन्दी पत्रकारिता ने देश में कई विषम परिस्थितियाँ देखी। अनेक प्रतिबंधों के पश्चात भी अपने पूरे जोश और स्पष्ट मतों के साथ भारतीय समाज के सामने प्रस्तुत हुई।
अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों से मुक्त होने के संघर्ष में पत्रकारिता की बहुत अहम भूमिका रही है। उस समय पत्रकारिता एक तरह से आजादी की मशाल बना। भारतीय जनता को एकजुट करना और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने में समाचार पत्र-पत्रिकाएँ सबसे आगे थीं। उस समय समस्त भारत में समाचार पत्र-पत्रिकाओं का स्वर्ण-युग था। अपने देश के हालात और सामाजिक कार्यकलापों की जानकारी के लिए सभी लोग इन पर आश्रित हुआ करते थे। उसके पश्चात रेडियो ने भी पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और अंग्रेजों की गुलामी से आजादी की लड़ाई में बराबर का योगदान दिया। भारत के निर्माण और विकास की मुख्य धारा में पत्रकारिता का बहुमूल्य योगदान है। इसीलिए विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के बाद चौथा स्तम्भ प्रेस/मीडिया को ही माना जाता हैं। समय था जब पत्रकारिता पर सभी लोग आँख मूँद कर विश्वास करते थे। संशय का तो कोई प्रश्न ही नहीं था ।
समय जैसे-जैसे आगे बढ़ा, पत्रकारिता ने भी रंग बदले, रूप बदले, बेहद आकर्षक, बेहद स्वतंत्र और कुछ ज्यादा ही मुखरित। भारतीय लोकतंत्र के पोषण और विकास में पत्रकारिता, प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक का महत्वपूर्ण योगदान है। हालांकि परिवर्तन की इस यात्रा में कई उतार-चढ़ाव भी आए लेकिन पत्रकारिता समय के साथ नए-नए कलेवरों और नए-नए माध्यमों के साथ जनता को मंच देती रहीं। इक्कीसवी सदी में पत्रकारिता के सामने कई तरह की चुनौतियाँ आयीं हैं, उसके पश्चात भी लोकतन्त्र की विविधताओं, समस्याओं और राजनीति से लेकर सामाजिक समस्याओं को अपनी मुखरित कलम से पत्रकारिता ने जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है। चाहे सामाजिक चेतना की बात हो या राजनैतिक उथल-पुथल हो अथवा देश-दुनिया की खबरें हो, पत्रकारिता हमेशा ही चैतन्यमयी रही है। राष्ट्रीय उत्थान, जन-जागरण यह पत्रकारिता के मुख्य लक्ष्य थे। मुख्यतः इसका आधार वैचारिक होता है।
कुछ ऐसे नाम जो पूर्वकाल में हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा थे वो आज भी हमारी स्मृतियों में ताज़ा हैं और कुछ तो आज भी प्रकाशित हो रहें हैं इसमें धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, माधुरी, राजस्थान पत्रिका, दिनमान, नवनीत, सरिता, मुक्ता, कादंबिनी, नवभारत, दैनिक भास्कर, अमर-उजाला, जागरण, लोकमत, युगधर्म, पंजाब केसरी, सकाल (मराठी, हिन्दी), सामना (मराठी हिन्दी), इंडिया टुडे इत्यादि नाम बड़े महत्वपूर्ण है, इसी क्रम में आजादी के बाद के पत्रकारिता के विकास में बड़े-बड़े शहरों के अलावा छोटे-छोटे नगरों में भी समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का सिलसिला जारी है। इस क्रम में निष्पक्ष जन-संसार, मरू त्रिकोण, युग पक्ष, त्याग मित्र, जैसे समाचार पत्र भी पत्रकारिता के इस महत्वपूर्ण यज्ञ में अपनी समिधाएँ भेंट कर रहें हैं। आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ बंद भी हो चुकी हैं जो दु:खद है।
कहते हैं पत्रकारिता के लिए अदम्य साहस की आवश्यकता होती है। साहस और निर्भीकता दोनों ही पत्रकारिता के लिए जरूरी हैं। लोकतन्त्र के किसी भी पक्ष को रेखांकित करना हो तो पत्रकारिता ने अपनी भूमिका सदैव निष्पक्ष रखी है। लेकिन प्रश्न यह है कि इतनी सकारात्मक भूमिका निभाते हुये भी वर्तमान में पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर क्यों उठाई जा रहीं है उँगलियाँ? क्यों बार-बार इसे कटघरे में खड़ा किया जा रहा है? आइये जानते है विस्तार से।
हमें यह ज्ञात है कि लोकतन्त्र के इस युग में हर भारतीय स्वतंत्र है। उसकी मौलिकता, उसके विचार, उसके मत, उसकी अभिव्यक्ति सब कुछ स्वतंत्र है। इस स्वतन्त्रता के नाम पर, या कहें कि इस मौलिक अधिकार के नाम पर आज हर भारतीय कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि नियमानुसार या संविधानुसार हर मौलिक अधिकारों की सीमाएं और मर्यादाएं भी होती हैं। पत्रकारिता ने स्वतन्त्रता के पश्चात और स्वतन्त्रता के पूर्व भी अपनी मुखरित आवाज और धारदार लेखनी से हर दिशा और दशा में अपनी आवाज बुलंद की। कभी गुलामी की जंजीरों में घुटती जनता के दर्द को आवाज दी तो कभी उनके ऊपर हो रहें जुल्मों का प्रतिकार भी किया। समाचार-पत्रों के माध्यम से जनता की आवाज को नेताओं तक पहुंचाने का श्रेय भी पत्रकारों को जाता हैं। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो मीडिया/प्रेस जनता और अन्य दूसरी पालिकाओं के मध्य में एक सेतु का काम करती है। ऐसे में इस ‘सेतु’ की विश्वसनीयता मायने रखती है इसलिए इसे बहुत ही मजबूत और निष्पक्ष होना चाहिए लेकिन इन दिनों यह स्थितियाँ उतनी अधिक ईमानदार और निष्पक्ष नहीं है।
एक समय हुआ करता था जब प्रेस/मीडिया निर्भीक होकर अपने मत रखा करती थे, जिस कारण आम जनता पत्रकारिता पर आँख मूँद कर विश्वास करती थी अर्थात प्रेस/मीडिया में जो भी आ रहा हैं, वह सब सत्य है और विश्वसनीय है, ऐसा ही माना जाता रहा था। किन्तु समय के साथ-साथ इन दिनों भारतीय-पत्रकारिता भी कुछ हद तक स्वतन्त्रता की सीमा लांघ कर स्वच्छंदता की ओर बढ़ रही है। अब अभिव्यक्ति का यह विश्वसनीय ‘सेतु’ चरमरा रहा है, लड़खड़ा रहा है। देश-विदेश के हालचाल जानने के लिए यदि आप समाचार-पत्र पढ़ रहें हो अथवा टीवी पर न्यूज़ देख रहें हों, सबकी विश्वसनीयता पर संदेह किया जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि आज प्रेस/मीडिया स्वतन्त्रता के नाम पर और अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए अब मनगंढ़त समाचार लिखते हैं और मिर्च-मसालें लगा कर खबरें सुनाते हैं या आधी-अधूरी सुनाते हैं और मिर्च-मसाला लगा कर खबरें परोसना तो अब आम हो गया है। अधिकांश प्रेस/मीडिया ने किसी न किसी ‘पक्ष’ का दामन थाम लिया है और अब वें उनके अनुसार खबरें सुनाते हैं और छापते हैं। पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता के कारण अब उसमें अब वह पहले की तरह पारदर्शिता नहीं रहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर पत्रकारिता का अब व्यवसायिकरण हो चुका है। लेकिन इसके बाद भी अब भी कुछ ऐसे मीडिया/प्रेस हाउस हैं जो बड़ी ही निर्भीकता के साथ अपनी बात कहते और लिखते हैं लेकिन ऐसे निर्भीक पत्रकारों और मीडिया हाउस को इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है। कितने ही पत्रकारों को इस निर्भीकता के कारण अपनी जान भी गंवानी पड़ी।कितने ही पत्रकार अब भी कारावास में बंद पड़े हैं। गौरी लंकेश जैसे कई पत्रकारों की हत्या का उदाहरण किसी से छुपा नहीं है।
फिर भी वर्तमान में कुछ गिने-चुने समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ आज भी पूरे हिम्मत और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता का मान-सम्मान बढ़ा रहीं है। और निर्भीकता के साथ लोकतन्त्र के सच को सामने भी रख रहीं हैं। इंटरनेट के कुछ फायदे भी है जिसमें कई यूट्यूब चैनल पूरी निर्भीकता और ईमानदारी के साथ लोकतन्त्र के तथ्य जनता के सामने रख रहें हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में आज समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, टीवी चेन्ल्स के साथ ही कई मुख्य यू ट्यूब चेन्ल्स भी अत्यंत लोकप्रिय और विश्वसनीय हो गए हैं। भारत के समाचार-पत्र, पत्रिकाओं के पंजीयक के अनुसार भारत में हिन्दी-भाषा में सर्वाधिक समाचार-पत्र प्रकाशित हो रहे हैं और इस क्रम में दूसरे स्थान पर अंग्रेजी भाषा हैं। स्वतन्त्रता के बाद वर्तमान में आधुनिक संसाधनों और टेक्नॉलॉजी के कारण पत्रकारिता में एक नए युग का आरंभ हुआ है।जिससे प्रकाशन और पत्रकारिता के सभी कार्य त्वरित और सुगम हो गए हैं। आज पत्रकारिता ने ‘श्वेत-श्याम’ से ‘रंगीन’ आवरण ले लिया है। फिर भी ईमानदारी, निर्भयता, निष्पक्षता और पारदर्शिता आज भी हिन्दी-पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती है। और इसीलिए भारत वर्ष के इस विकास के दौर में हिन्दी पत्रकारिता के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारियाँ हैं।
********************
भोपाल, मध्यप्रदेश।