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Lahak Digital > Blog > Literature > उमेश पकंज की कविताएं
Literature

उमेश पकंज की कविताएं

admin
Last updated: 2026/06/19 at 12:19 PM
admin
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5 Min Read
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 बिजूका
…………….

मुझे जाना था कहीं
लेकिन जान नहीं पाया
कि गया कहां

Contents
 बिजूका …………….कौंध …….झंगांठ पेड़ ………….पेट …….तब भी वह चला गया ………………..चेतना …………. खूब समझता हूं ………………..

मुझे आना था जहां
नहीं जान पाया
कि आया कहां

बस आना जाना करता रहा
बैठे रहने वाले
पूछते रहे
इसके शिवाय
कुछ किया क्या ?

दरअसल
न तो मैं गया कहीं
न ही आया कहीं से
बल्कि
लाया गया किसी के द्वारा
और
खड़ा कर दिया गया
हरे भरे खेत में
बिजूका की तरह !

कौंध
…….

एक गहरी नदी में
बैठ गया था पलथी मारकर

वह कब आया
और कब चला गया
पता ही नहीं चला
हवा से भी तेज रही होगी
उसकी गति
हो सकता है हुई हो
थोड़ी सुरसुराहट
फिर आया हो उछाल
कुछ कौंध भी हुई होगी जरूर
तभी मैं लपका !

कितना कठिन है
कौंध को पकड़ना
और पकड़कर लाना कविता में !

झंगांठ पेड़
………….

इसी धूल माटी में
तुम्हें रहना है
सहना है – लात जूते !

और
इसी जमीन को फोड़कर
निकलना है
ऊपर उठना है
वैसे
जैसे निकलता है कोई बीज

बनना है तुम्हें झंगांठ पेड़!

पेट
…….

सफेद साफा बांधकर
खच्चर पर चढ़कर तुम आए
और निगल गए विशाल हाथी !

कितना बड़ा पेट है तुम्हारा
पचा जाते हो पूरा का पूरा जंगल
ढकोस जाते हो ऊंचे ऊंचे पहाड़
सुडक जाते हो सारी नदियां !

कैसी फ़ितरत है तुम्हारी
अपने पेट में जमा करते हो बारूद
विध्वंसक हथियार
क्या चाहते हो
नष्ट हो जाए यह दुनिया ?

सोचा है तुमने कभी
ठूंसते रहे सब कुछ
उल्टियां करोगे
गुब्बारे की तरह फूल जाएगा
एक छोटी कील से ही फट जाएगा
तुम्हारा पेट

बचेगा सिर्फ
एक वीरान गड्ढा
जिसे नहीं कहा जा सकता
इस दुनिया के नक्शे में
टंगा हुआ कोई देश !

तब भी वह चला गया
………………..

अपनी गोद में उसे लेकर
मजबूती से पकड़े हुए
दौड़ रहा था अस्पताल
तब भी वह चला गया

पुश्तैनी मकान बेच दिया
खेत बेच दिए
पत्नी के गहने बेच दिए
चाहता था
गूंजती रहे किलकारी
तब भी वह चला गया

ठेले पर समोसा बेचने वाले की
औकात ही कितनी !

बेचकर सब कुछ
कुछ उधार लेकर
जमा किए चालीस लाख
अस्पताल में
तब आए डॉक्टर हरकत में
ऑपरेशन का औजार पकड़ा
पुख्ता इंतजाम किया
कि निकल आए मौत के मुंह से बाहर
तब भी वह चला गया

महज पांच साल का था वह
अभी देखी नही थी दुनिया
उम्र नहीं थी जाने की
तब भी वह चला गया!

बुक्का फाड़कर रोते हुए
उसने जब देखा मां को
छटपटाते छाती कूटते
पिता को
तो फूट गई धार पीड़ा की
जैसे टूट गई
पानी से भरी
कोई गगरी

वह चाहता था रहना सबके साथ
इस दुनिया में

वह नहीं चाहता था जाना
तब भी वह चला गया

चेतना
………….

लाल पीला नहीं हुआ
हार कर भी बना रहा हरा

तुम पीला पड़ गए
पत्ते की तरह
जीतकर !

फड़फड़ाए
टूट कर
गिर गए
हवा में उड़ गए ?

कहां हो तुम ?

तुमको ढूंढ रहा हूं
कब से !

हारकर बचा हुआ हूं मैं
बचा हुआ है
मेरा धैर्य
मेरा विवेक
मेरा आत्मबल
अभी मरी नहीं है मेरी चेतना !

 खूब समझता हूं
………………..

ऐसा नहीं है कि
मैं यह नहीं जानता कि
आया कहां से और जाना कहां है
चला कितना और बाक़ी है कितना
कितना नीचे हूं और ऊपर कितना

यह जो अंधेरी गुफा है
उसमें भटकना है अभी बहुत
असंभव नहीं है बाहर निकलना
यदि चलता रहा यों ही

मैं खूब समझता हूं
काठ की हांडी है चूल्हे पर
भात नहीं पकेगा
समंदर की लहरों पर
कागज की नाव है
डूब जाना है

सूरज तो महज धोखा है
शाम ढलते ही छिप जाएगा
दीया बांधकर माथे पर बढ़ता हूं आगे
जानता हूं जलना और तपना

यह जीवन तो सर्कस है भाई !
दो खड़े विपरीत बांसों से
बंधी पतली रस्सी पर चलना
तो फिर काहे का डरना

चुनौती किसे दे रहे हो भाई !
” चबाओ !
तुम ठीक से चबाओ लोहे का चना
दुखों का रस अंदर चला जाएगा।


दिल्ली/ लखनऊ

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admin June 19, 2026
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