झर – झर करती बारिश
झर-झर करती बारिश
याद आ गयी प्यारी,
भूली सी कोई ख्वाहिश !
छूट कर भी कहाँ छूटती है याद
क्या कोई करता रहता फ़रियाद !
रेगिस्तानी घर के उस आँगन में बारिश सुनाती थी तराने
और छत के नालों से उतरते
नाचते पहाड़ी झरने !
प्रकृति का संग
कितना लौकिक,
कितना अलौकिक रंग !
आँखों में बस जाते घर
न कोई सुनता,
न देखता,
होती बातें जी-भर !
कुछ यादों पर काल की पड़ती नहीं कोई धूल !
ज़िंदा ऐसे जैसे अभी-अभी खिला हो कोई फूल !
यह प्रकृति है!
ग़ज़ा से आख़िरी खत !
ग़ज़ा से आख़िरी खत !
-सरला माहेश्वरी
ये आख़िरी ख़त है —
ग़ज़ा से,
ग़ज़ा की एक फ़िलिस्तीनी लड़की का आख़िरी ख़त !
हर रोज़ तबाह होते इस शहर का आखिरी ख़त !
लगता है आप सब
ग़ज़ा के ख़त्म होने का ही इंतज़ार कर रहें हैं !
हर सुबह चारों तरफ़ बिखरी लाशें !
भूख-प्यास से बिलखते बच्चे !
सफ़ेद कफन में
लिपटी नन्हीं लाशों को चूमती माँए !
कल जो बच्ची हँस-खेल रही थी
जिसकी तस्वीर को देख आप मुस्कुराए थे
आज वो लाश बन चुकी है !
एक नहीं हज़ारों बच्चे
पल भर में ख़त्म हो गये !
अभी-अभी जन्मे वे नवजात बच्चे जिन्हें
माँए जी भरकर देख भी नहीं पाई !
आपको बहुत बुरा लग रहा है न ?
आप ये सब देख नहीं सकते, देखना नहीं चाहते !
भला कौन देखना चाहेगा !
जाइये आराम से रहिये !
अलविदा !
“अब से हमारी ख़बरें आपको परेशान नहीं करेंगी ,
बस कुछ ही दिनों की बात है और सभी चले जाएँगे.”
पर ग़ज़ा की मिट्टी !
ग़ज़ा की हवा में हमारी सिसकियाँ गूंजती रहेगी !
उसे कोई दबा नहीं सकता !
कोई ख़त्म नहीं कर सकता !
ये मानवता की सिसकियाँ है !
चचा ग़ालिब ! या-रब तुम्हें कहाँ से वो कई दिल देता !
चचा ग़ालिब ! या-रब तुम्हें कहाँ से वो कई दिल देता !
एक दिल बनाने में ही शायद उम्र गुज़र जाती है
लगता है उसने दिल बनाना ही बंद कर दिया है !
अब बिना दिल वालों की ये दुनिया है
भले ग़मों की आँधी गुज़र जाए,
इस पर कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता !
खून से लथपथ एक बच्ची सड़क पर गुहार लगाती है
पर किसी का दिल ज़रा सा भी धड़कता नहीं
कोई उसके नंगे शरीर को ढकने
एक गज कपड़ा भी देने आगे नहीं आया
हे महाकाल ! ये कैसा काल है ?
एक कमजोर लड़का प्रसाद चुराने के
जुर्म में पीट-पीट कर मार दिया जाता है
क्या तुमने दिल की जगह पत्थर लगाना शुरु कर दिया है ?
उर्दू ज़ुबां भी क्या ख़ूब है
उर्दू ज़ुबां भी क्या ख़ूब है
जैसे झूमती पहाड़ी नदी
जैसे आसमाँ से झरती बर्फ़
जैसे बरसती बरखा
जैसे खिलता चाँद
जैसे गुनगुनी धूप
जैसे मासूम सी हँसी
ज़िंदगी में जान जैसी
मोहब्बत की खान जैसी
मेरी बहना ओ उर्दू जुबां !
आओ मिलकर गाएँ हम
ज़िंदगी के गीत साथ-साथ !!
-सरला माहेश्वरी
ओ शरद के चाँद!
ओ शरद के चाँद!
ओ शरद के चाँद!
बहुत दिन हो गये ये बच्चे मुस्कुराए नहीं है!
बच्चे मलबे में खोज रहें हैं अपनों को
अपनी अम्मी, अब्बू को
अपनी छोटी सी बहन को
दोस्तों को
अपने घर को
उनके चारों ओर मलबा ही मलबा है
उनकी आँखों में भी बस ये मलबा है!
ये बच्चे रात-रात भर सो नहीं पाते
थकी हुई आँखें अगर झपक भी जाती हैं तो
डर की चीख के साथ फिर खुल जाती हैं
क्या होगा इन बच्चों का?
ग़जा के ये बच्चे! भुगत रहे हैं कैसी ये सजा!
क्या इन डरते हुए बच्चों के हाथ में
कोई फिर पकड़ा देगा बम, पिस्तौल!
क्या आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का
ये खूनी खेल ऐसे ही चलेगा?
ओ शरद के चाँद!
क्या तुम भी चुपचाप देखोगे ये खेल?
नहीं! तुम नहीं करोगे ऐसा!
आज की रात तुम ग़ज़ा की इस धरती के और क़रीब आ जाना
इन बच्चों को अपनी गोद में लेना
इन्हें सुंदर सी कहानी सुनाना
सुबह जब ये बच्चे उठे तो
इनकी आँखों में मीठे सपने हों
इनके चेहरों पर मुस्कान हो!
बहुत दिन हो गये ये बच्चे मुस्कुराए नहीं हैं!
ओ बच्चों के चंदा मामा!
इन बच्चों के लिये इतना तो करना!
आमों से भरा-भरा ये पेड़
आमों से भरा-भरा ये पेड़
प्यार से लदा-लदा, झुका-झुका सा ये पेड़
सुबह -सुबह मन को हरा-भरा कर देता ये पेड़
माँ के आँचल जैसा ये पेड़
पिता की छाँव जैसा ये पेड़!
जाने क्यों ये याद दिलाता मुझे
माँ के उस जादुई थैले की
जब भी बाहर से आती वो
झोले में भरकर लाती ढेर सारा प्यार
खट्टी-मीठी लेमनचूस, तरह-तरह के बिस्कुट
मूँगफली, मीठे चने
देखकर उन्हें नाच उठतीं हम बहनें
थोड़े से पैसों में जाने कैसे माँ ख़रीद लाती पूरा संसार !
आम की रूत में
माँ थैले में भरकर लाती आम !
माँ के हाथ का वो आमरस !
आज भी जीभ नहीं भूलती उसका स्वाद
माँ कहती जाओ दौड़कर लाओ बर्फ
ठंडा-ठंडा वो आमरस और
वो पतले, नरम रुई जैसे माँ के हाथ के फुलके
ख़ूब मज़ा ले-लेकर खाते और ग्लासों में भरकर
आमरस पीते-पीते घर के तलघर में होती पढ़ाई !
जाने क्यों लगता है जैसे ये पेड़ नहीं
माँ का प्यार भरा वही थैला है !
जब भी देखती हूँ उसे
ख़ुशी से झूम उठता है ये !
तो कभी देखकर इसको याद आते हैं पिता
ठंडा-ठंडा बेल का वो शरबत
बिलकुल पारदर्शी
बिना हाथ से छुए बस छानते जाते
न जाने कितनी बार
बेल की वो ख़ुशबू पिता की ख़ुशबू जैसी ही
चारों ओर फैल जाती !
वैसा शरबत भी तो कोई नहीं बना पाता !
माँ-पिता शायद इसी तरह फूलों-फलों से लदे पेड़ों की तरह ही
बरसाते रहते हैं अपना प्यार !
दशरथ माँझी से दीना माँझी तक
दशरथ माँझी से दीना माँझी तक
दशरथ माँझी से
दीना माँझी तक
जिंदगी का एक ही सच !
पहाड़ ही पहाड़ !
समस्याओं के पहाड़ !
भूख और ग़रीबी के पहाड़
दुखों के पहाड़ !
अचल ! अटल ! शास्वत !
मजबूरी के पहाड़ !
शान से खड़े हैं
सत्ता की मनमानी के पहाड़
शाइनिंग इंडिया के पहाड़
डिजिटल इंडिया, मूविंग इंडिया के पहाड़
सफरिंग इंडिया के पहाड़
ग़ुलामी से आज़ादी तक !
बेशर्मी से टिके हुए हैं पहाड़ !
गण के तंत्र पर बैठे हुए
तुमको
ठेंगा दिखाते हुए
गर्व से हँसते हुए,
जमे हुए हैं राजसी….
कोलकाता, पश्चिम बंगाल