ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
पहाड़ों की छाती पर जिसने इतिहास लिखा,
बर्फ़ीली हवाओं से जिसने भय को हर लिया।
लद्दाख़ की चुप्पी ने नाम उसका गाया,
ज़ोरावर सिंह — शौर्य का सूर्य बन आया।
ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
कश्मीर की वादियों से उठा जो रणघोष,
तिब्बत की सीमाओं तक पहुँचा उसका ओज।
कम साधन, सीमित सेना, पर अडिग विश्वास,
रणनीति में बुद्धि, भुजाओं में प्रकाश।
ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
बर्फ़ में जलते कदम, आँखों में स्वप्न अपार,
भारत की सीमाओं का रचा नया विस्तार।
न झुका तूफ़ानों से, न ठिठका कठिन राह में,
हर शिखर ने शीश नवाया उसकी चाह में।
ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
दुश्मन की चालें टूटीं उसके साहस के आगे,
शब्द कम पड़ जाएँ उसकी गाथा को गाने।
रणभूमि में था साधु-सा, क्रोध में महाकाल,
धैर्य, अनुशासन — उसके जीवन का भाल।
ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
पराक्रम की कीमत उसने रक्त से चुकाई,
तिब्बत की धरती पर वीरगति पाई।
शरीर गिरा पर आत्मा रही अजेय,
इतिहास ने कहा — यह अंत नहीं, यह जय।
ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
आज भी बर्फ़ीली रातों में नाम गूंजता है,
हर सैनिक के हृदय में साहस बन बसता है।
सीमा की हर चौकी पर उसकी छाया खड़ी,
मातृभूमि की रक्षा में अडिग, सदा अडिग।
ज़ोराबर सिंह शोर्य त्याग का अमर वीर
ओ ज़ोरावर सिंह, तेरा जीवन संदेश महान,
कर्तव्य, त्याग और शौर्य की अमर पहचान।
जब तक भारत की नसों में बहता लहू,
तेरी गाथा गूंजेगी — युगों-युगों तक यूँ।
प्यार यूं ही ठहर जाए
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
पलकों पर आधी-सी धूप है,
आधी-सी चाँदनी आए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
हाथ मिलें पर थामें नहीं,
धड़कन चुप-सी रह जाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
बादल की ओट से चाँद झुके,
कुछ रौशनी छिटक जाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
तितली रंग छुए पलकें,
पर कोई रंग न कह पाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
डाली पर गिलहरी ठिठकी,
दाना आधा गिर जाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
बात अधूरी होठों पर,
साँसों में लय भर जाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
रेशम-मन की छोटी गाँठ,
खुलते-खुलते रह जाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
आँखों की शांत झीलों में,
एक लहर बस रुक जाए —
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
प्यार यूँ ही ठहर जाए।
जय अम्बे जगदम्बे माता
जय अम्बे जगदम्बे माता,
जय अम्बे जगदम्बे माता,
करुणा की तुम सागर दाता।
तेरी ज्योति जग में छाए,
हर अंधियारा दूर भगाए।
शरण तुम्हारी जो भी आता,
खाली हाथ कभी न जाता।
जय अम्बे जगदम्बे माता,
शैलपुत्री सा धैर्य सिखाओ,
अडिग विश्वास हृदय में लाओ।
ब्रह्मचारिणी तप की मूरत,
जीवन को कर दो तुम सूरत।
चन्द्रघंटा सी शान्ति बरसाओ,
मन के सब संताप मिटाओ।
जय अम्बे जगदम्बे माता।
कुष्माण्डा सी सृष्टि रचाओ,
नई ऊर्जा जीवन में लाओ।
हर कण में प्रकाश जगाओ,
भीतर का अंधकार मिटाओ।
स्कन्दमाता ममता बरसाओ,
हर दिल को प्रेम सिखाओ।
जय अम्बे जगदम्बे माता।
कात्यायनी वीरता भर दो,
अन्याय से लड़ने का बल दो।
सत्य मार्ग पर चलना सिखाओ,
धर्म की ज्योति मन में जलाओ।
कालरात्रि बन संकट हर लो,
हर भय को तुम दूर कर दो।
जय अम्बे जगदम्बे माता,
महागौरी सी निर्मलता दो,
पावनता का उज्ज्वलता दो।
हर विचार हो शुद्ध हमारा,
हर कर्म बने दीपक प्यारा।
सिद्धिदात्री कृपा बरसाओ,
जीवन को सफल बनाओ।
जय अम्बे जगदम्बे माता।
तेरे नौ रूपों की छाया,
जीवन को दे मधुर माया।
सत्य, प्रेम, सेवा की धारा,
बहती जाए हर इक द्वारा।
हर प्राणी में तेरा वास हो,
हर हृदय में तेरा प्रकाश हो।
जय अम्बे जगदम्बे माता।
पूरा ब्रह्माण्ड सुखमय हो जाए,
हर जीव शान्ति का गीत गाए।
द्वेष मिटे, सद्भावना आए,
मानव मानव को अपनाए।
सद्कर्मों की राह दिखाओ,
माँ, हमें अपना बनाओ।
जय अम्बे जगदम्बे माता,
जय अम्बे जगदम्बे माता,
अपने बिस्तर पर
अपने बिस्तर पर
मैं
अपनी नींद
किसी को बांट नहीं सकता-
चादर की सिलवटें
रज़ाई की गरमाइश
सिरहाने का नर्म दवाब
मेरी नींद के मित्र हैं-
चाहे जितना भी अंधेरा हो
थकावट भरे शरीर
व उसकी नींद को
कोई डर नहीं लगता-
बहुत सी आकृतियाँ
तैरती हुई
बिना शरीर के
मेरे मस्तिष्क में
घूमती रहती हैं
पानी जैसीं-
कमल के पत्ते
जैसा कोई
मेरे भीतर
उस पानी को
ठहरने नहीं देता-
हीरा,सोना
किसी भी किस्म की
कोई भी
अमूल्य धातु
मेरी नींद को
मेरे पास आने के लिए
रोक नहीं सकती-
जितना समय
मैं रोज़
किसी भी कार्य के लिए
जागता हूँ
उसका तीसरा हिस्सा
मेरी नींद के लिए
अवश्य होता है-
असल में
नींद का कोई
बिस्तर नहीं होता-
जहां भी आ जाए
प्यार से दबे पाँव
आ जाती है-
आधी पृथ्वी जाग रही होती है
आधी पृथ्वी नींद में होती है-
चाय का कप
काफी का मग
बिखरे बाल
मंदिर की घंटी
घड़ी का टाइमर
नलके का पानी
कुत्ते का भौंकना
बिल्ली की म्याऊं
चिड़ियों का चहकना
बारिश का गिरना
बादलों का गरजना
समुद्र की लहरों की आवाज़े
दरिया के बहने की ध्वनि
रबड़ में लिपटी अखबार
मेरे शरीर से अनदेखा स्पर्श
मेरी नींद पूरी हो जाने पर
मेरा स्वागत करते हैं-
परन्तु
इन किसी से भी
मैं
अपनी नींद
बांट नहीं सकता
‘झूठी कविता रच रहा हूँ’
कविता के माध्यम से
सीधी व सरल बात है
बहुत सी समस्याएं हैं संसार में
इनमें बहुत सी हम लोगों ने
ख़ुद ही अपने हाथों से बुनी हुई हैं-
शुरू से लेकर अब तक बनाए
सभी किस्म के आधुनिक हथियार
मानव का विध्वंस
ज़मीन पर जबरदस्ती आधिपत्य
स्त्रियों पर तरह तरह के अत्याचार
हम लोगों ने ही बनाए हैं
स्वार्थ व अंहकार की चरमसीमा
हम लोगों के भीतर ही तो है
इससे सदियों से व्यक्ति की
संवेदनाओं से खिलवाड़ हो रहा है
परन्तु आजतक रुका नहीं
हमारी झूठी शान, दिखावा
पैसों का घमंड, दानव प्रवृत्ति,
हर समय दिशाहीन उन्नति,
निर्लज मौन है-
क्यों हमें सबसे बड़ा घर चाहिए
क्यों हमें सबसे महंगी गाड़ी चाहिए
क्यों हमें सबसे बड़ा बनना है
क्यों कमज़ोर व्यक्ति को नौकर बनाना है
यह सवाल तो अपने आप से पूछने पडेंगे
अपने बड़ों से पूछने पडेंगे
पहले सरदार, फिर राजा
अब नेता
इनको सभी सुविधाएं मिल जाती हैं
फौरन से पहले
और हम लोग ही डर डर के
इनको सभी सुविधाएं देते हैं
इनके आगे झुकते हैं
इनके अपमान को सहते हैं
सारा धन तो यही खा जाते हैं
बड़े बड़े व्यापारियों के साथ मिलकर
जिनके पास सौ सौ गाड़ियों का
काफिला होता है
यह कैसा घटिया किस्म का
संसार चला रहे हैं
बच्चों को जो स्कूल में सिखा रहे हैं
बाहर उसका उल्टा है
आओ अब चोर, डाकू, लुटेरे बनो
और रोज़ झूठ की खेती करो
अद्भुत है जिस कागज़ को जलना है
वही हमारा धन की शक्ल में
माया से भरा दायित्व निभाता है
और इसके ज़िम्मेदार शत-प्रतिशत
हम स्वंय हैं
यह कलाकारी, कविता, नाटक, संगीत
योग,आध्यात्मिक सोच, सभी अविष्कार
हमसे कैसे होते हैं
जबकि संसार में कोई भूखा सो रहा है
कोई पीड़ा में है
किसी स्त्री का शोषण हो रहा है
कोई किसी को मार रहा है
किसी का घर गिराया जा रहा है
किसी की ज़मीन छीनी जा रही है
और मैं
अभी भी
झूठी कविता रच रह हूं …
विजय सराफ मीनागी, जम्मू