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Lahak Digital > Blog > Literature > राकेश भारतीय की सात कविताएँ
Literature

राकेश भारतीय की सात कविताएँ

admin
Last updated: 2026/05/18 at 8:15 AM
admin
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7 Min Read
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Contents
घर मेरा नहींखेला चुनाव काउदासी की कोठरीउम्र के इस मोड़ परमुहब्बत के लिए नाकाबिल शहरजाति न पूछे कोययादों का घड़ापता –590, डी.डी.ए. फ्लैट्स, पाकेट-1, सेक्टर-22, द्वारका, नई दिल्ली-110077

घर मेरा नहीं

उस घर को अपना मानने से डरता हूँ

घर जिसमें मैं आजकल रहा करता हूँ

मुझे जो अच्छा लगता है वो दूसरों को नहीं

अच्छा जो उन्हें लगता है, मुझे समझ में आता नहीं

कि किसी दूसरे ही  घर में घुसने का भरम होता है

फिर-फिर दरवाजों और खिड़कियों को देखकर

तसल्ली करना चाहता हूँ कि वही घर तो है ये

तो घर की हवा का अजनबीपन महसूस करता हूँ

बहुत अफनाहट हो जाने पर अपने को आईने में

बरसों पहले से घर में मौजूद मेरे ही आईने में

फिर-फिर देखता हुआ फिर तसल्ली करना चाहता हूँ

पर तभी घर में मौजूद बाकी आँखों का बहुत

घूर-घूरकर मुझे आईना सा दिखाना सहता हूँ

इसीलिए उस घर को अपना मानने से डरता हूँ

घर जिसमें मैं आजकल रहा करता हूँ।

***

खेला चुनाव का

है बजा बिगुल चुनाव का, सक्रिय हो गये हैं दल के दल

किसी के पास धन का बल तो किसी के पास है बाहुबल

कुछ ही हफ्तों में बटनदबाऊ वोट-मशीन पर नपेगा बलाबल

कोई कहे महा-झूठा है वो दल, कोई चिल्लाये बड़का चोर ये दल

बीच-बीच में दलबदल कर रहे देते हैं बयान खूब बदल-बदल

कार पर ही चलनेवाले वोट मांगने जाते अब पैदल-पैदल

जींस-टीशर्ट में जो सदा सुसज्जित घूमें अब पजामे-कुर्ते में भेस बदल

जो चढ़े रंग चुनाव का तो चढ़ न पाये कोई भी दूजा रंग

बेरंग ज़िंदगीवालों के सामने गिड़गिड़ायें गिरगिट वादे लेकर रंगारंग

मार भकुवाय-चकराय वोटर देखे जायें ये तमाशा चुनाव का

चंद दिनों की बात-बहार के बाद जीवन वही रहेगा, ठहराव का

पोथी पढ़-पढ़कर ज्ञानी भये टेरे जायें गुण पर गुण इस लोकतंत्र के

जिसमें चुनाव के रास्ते तंत्र होगा ही सवार बेचारे लोक के सिर पे

आओ भैया, आओ बहिनी बटन दबाकर सफल करो ये चुनावी खेला

खेला जिसमें तंत्र पर काबिज हो जायेगा कोई सयाना, तुम्हें न मिलेगा धेला।

***

उदासी की कोठरी

चाहता नहीं हूँ मगर न चाहते हुए भी मैं कभी-कभी

अपनी उदासी की कोठरी में जाकर चुप बैठ जाता हूँ

खोलता हूँ वहाँ बैठकर एक के बाद एक सारी गठरियाँ

छूटे हुए लोगों से लेकर टूटे हुए रिश्तों की गठरियाँ

अधूरे रह गए सपनों की गठरियाँ ,पराये बने अपनों की गठरियाँ

फिर बिसूर लेता हूँ जब घंटों-घंटों गठरियाँ खोले हुए

तो चुपचाप गठरियाँ वापस बाँधकर बाहर निकल आता हूँ

बाहर किसी को पता ही नहीं उस कोठरी के बारे में

बड़ा हँसमुख और ज़िंदादिल है, कहते हैं वे मेरे बारे में

अब पता चलेगा भी कैसे उस कोठरी का किसी को

मैं ही तो ताला खोलता हूँ उसका, मैं ही तो बंद करके आता हूँ।

***

उम्र के इस मोड़ पर

कितना कुछ खो चुका हूँ,कितना कुछ और खोना बाक़ी है

उम्र के इस मोड़ पर बस यही एक हिसाब बाकी है

खो चुके में शामिल इन्सान, पहचान, मकान-दुकान

एक वक़्त बहुत ही प्रिय रहा वो ज़िंदगी का सारा सामान

याद कर-कर गिनने लगता हूँ तो सही हिसाब मिलता नहीं

हिसाब मिल जाये भी तो उसे हिसाब मानने का जी करता नहीं

ये खोये हुओं का ही हिसाब दिल पर इतना ज्यादा भारी है

कि और कुछ खो सकने का ख़याल कर पाना ही दुश्वारी है

फिर भी खोना पड़ेगा ही जो कुछ और खोना अभी बाक़ी है

उम्र के इस मोड़ पर बस यही एक हिसाब बाक़ी है।

***

मुहब्बत के लिए नाकाबिल शहर

मुहब्बतें लेकर आया था इस शहर में पर मायूस होकर बैठा हूँ

अपनी झोली मुहब्बतों की वैसी की वैसी लिये हुए बैठा हूँ

मुहब्बत करने से पहले लोग यहाँ हमारा नाम जानना चाहते हैं

नाम बताने के बाद गाँठ में है कितना दाम ये भी जानना चाहते हैं

नाम-दाम से काम चल जाता तो भी ग़नीमत समझ लेता मैं

पर यहाँ तो बाशिन्दे नस्ल और मज़हब का तामझाम भी जानना चाहते हैं

इतना सोच-सोचकर जो मुहब्बत करने के बारे में सोचा करे

उसे तो हम जैसे सिरे से मुहब्बत के लिए नाकाबिल मानते हैं

यही मेरी मायूसी का सबब है , इसी मायूसी के साथ अब उठते हैं

कभी न वापस आने के लिए अब इस शहर से हम उठते हैं।

***

जाति न पूछे कोय

जाति को कपार पर चिपकाये चलने से जाति नहीं जाती

दिलो-दिमाग़ से निकाल बाहर फेंकने पर ही है जाती

कबीर, रैदास का रट्टा मारने से बिलकुल नहीं जाती

उनके पदों की बातों पर अमल करने से ही है जाती

नेता-शेता के भोंपुओं पर कान बिलकुल न लगाओ

बाबा-शाबा के प्रवचनों के भुलावे में भी न आओ

दिन में तो उनकी ज़बान सबका समान होना बताती

रात को उन्हीं के सीने से जाति चिपकी नज़र आती

बस अपने से ही पूछो एक सवाल पूरी ईमानदारी से

पैदा होते ही तुम्हारी माँ अगर तुम्हें जंगल में फेंक आती

वहीं किसी और बिरादरी में तुम्हारी परवरिश हो जाती

तो साइंस के किस उपकरण या किसी ख़ास टेस्ट से ही

किस जाति के असल में हो तुम, ये बात तय की जाती?

सदियों से ढोये जा रहे इस बोझ को अब उतार फेंको

बदलती जा रही बड़ी दुनिया से अपनी पहचान जोड़ो

बड़ी दुनिया में ये कूपमण्डूकी पहचान पहचानी नहीं जाती

किसमें दम है कितना, बस यही एक बात है मानी जाती।

***

यादों का घड़ा

घूम-फिरकर वहीं फिर-फिर पहुँचना होता है

जहाँ अपनी यादों का घड़ा गड़ा होता है

पहले ही लहूलुहान हुए हाथों से खोद-खोदकर

निकालते हुए हाथ और लहूलुहान होता ही होता है

घड़ा निकाल कर उसके मुँह में हाथ डालते ही

जैसे कोई पुराना साँप नये फन से डँसता होता है

न यादों से पिंड छूटता है न उन तक पहुँचने की चाहत से

चेतन-अवचेतन में आदतन जैसे ये होता ही होता है

घूम-फिरकर वहीं फिर-फिर पहुँचना होता है

जहाँ अपनी यादों का घड़ा गड़ा होता है।

***

पता –590, डी.डी.ए. फ्लैट्स, पाकेट-1, सेक्टर-22, द्वारका, नई दिल्ली-110077

फोन – 09968334756,  ईमेल – bhartiyar@ymail.com

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