चलिए चलते हैं :
पक्षियों की चहचहाहटों से
पुन: एक बार तोड़ने को नींद
चलिए चलते हैं
गांव की ओर
धूप देखकर तेज
लू लौट आई है बस्ती में
उगा कर पीपल का एक पेड़
आइए हम भी लौट चलें
छांव की ओर
जलाशय हुई नदी
बना कर बांध कोई
उसे नहरों में डाल गया है
तप करें चलिए भगीरथ के लिए
फिर बुला लाए जो उस नदी को
है रेत में खड़ी अकेली बेचारी
लगाए टकटकी उदास
चप्पू संग चुप बैठी
नाव की ओर
गड्ढा मुक्त चिकनी सड़क
आकर बैठ गई है द्वार सभी के
रबर के पहियों के लिए दबाव बना रही
घुटने भूल रहे हैं अब चलना बिंदास
सर पर अपने लिए बोझ देह का
पगडंडियां निहार रहीं एकटक
पांव की ओर
( विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा आज)
डॉ एम डी सिंह
डॉ एम डी सिंह
नशा
जो न रहने दे शांत नशा है
जो कर डाले अशांत नशा है
कोई देशांतर पर घूमे दर-दर
किसी के लिए अक्षांश नशा है
नशा लड़ाई के पीछे है पसरा
अहिंसा से भी वही है चस्पा
हर युग का दृष्टांत नशा है
कर्म नशा है धर्म नशा है
कुकर्म और सत्कर्म नशा है
नशा सदा समानांतर भागे
तनिक ना पीछे तनिक न आगे
नशा नशेड़ी की ताकत है
नशा नशेड़ी की आदत है
जीवन भी आद्यांत नशा है
पूजा वंदना और अर्चना
ईर्ष्या क्रोध और भर्त्सना
कौन नहीं है नशा बताएं
घोर घृणा गहन मंत्रणा
नशा है संचय पाई-पाई
नशा बांटना पूर्ण कमाई
जीने का सिद्धांत नशा है
सबके ईश्वर अपने अपने
सबके पास अपने सपने
कोई खुशी में रोता है
कोई पीड़ा में सोता है
सुख किसी का संगी साथी
दुख किसी के साथ बाराती
मन का यही वृतांत नशा है
मान-सम्मान-अपमान
हर व्यक्ति हर संस्था का
एक माप एक तोल होता है
चेतन-स्थूल का मोल होता है
इसी तोल-मोल का वर्गमूल
किसी का मान होता है
एक के मान पर
दूसरे के प्रतिमान का
सहज संपूर्ण प्रत्यारोपण
विशिष्ट का सम्मान होता है
अपने मान के उन्नयन में लगा
सम्मानित रह जाता है ठगा
क्योंकि वह सम्मानों के
अतिरिक्त बोझ स॔ग
गतिमान होता है
अभिमान कर देता है परास्त
ईर्ष्या करती अपदस्थ मान को
हत्या करता जो मान सम्मान का
छीन लेता चेहरे से मुस्कान को
वही निष्ठुर अपमान होता है
सोच ले मन ——-
सवालात
ऐसा ना तो वैसा क्यों है
रुपया ना तो पैसा क्यों है
दया क्षमा की है बात तो
जैसे को ।फिर तैसा क्यों है
सवालात पर सवालात बस
ऐसा है तो ऐसा क्यों है
खड़ा प्रश्न है होता यह भी
मुझ सा ना तुझ जैसा क्यों है
जब सब कुछ हैं आप जानते
तब कहां किधर कैसा क्यों है
पेट भरे जो मुट्ठी भर से
पैसा पैसा पैसा क्यों है
कैसे कहें चोरी है
आंख चुराना ही असली चोरी है
बाकी सब तो बस माखन चोरी है
कर्म है पूजा तो चोरी भी कर्म है
इन चोरों से यह कैसी दूरी है
राम सबके उनका खजाना सबका
क्यों उसमें से कुछ लेना चोरी है
सवाल यह नहीं की कौन चोर है
सवाल खाली क्यों किसकी बोरी है
मथुरा करते तो बाल गोपाल जी
अयोध्या में किया तो बरजोरी है
होता वही है जो राम रचि राखा
फिर कैसे मानें इसको चोरी है
बोलो कौन नहीं है चोर जगत में
बस उनको कहना सीनाजोरी है
है सबसे संगीन तो दिल की चोरी
ले नहीं गई क्या कोई गोरी है
पूछूं तुम अवसरचोरों सच कहना
कहो औसर चोरी नहीं चोरी है
रुपए दोस्त हैं जगजाहिर जेब के
खुद जेब में गिर गए मजबूरी है
तुम कहो नहीं इसे आस्था की हत्या
इसे करने वाला तो अघोरी है
आ जिंदगी !
आ जिंदगी तेरे साथ उछलते हुए चलें
ख्वाबों की बस्तियों में मचलते हुए चलें
मैं तुझे तू मुझे चल ढो लें थोड़ा-थोड़ा
आ अपने-अपने कंधे बदलते हुए चलें
माना की मौत भी साथ चल रही हमारे
उसके भी गेसुओं को झटकते हुए चलें
काटों पे तरस खा गुलाबो जैसा खिलके
खुशबुओं जैसे हम भी पसरते हुए चलें
बहारों का वादियों में इंतजार होगा
बाहों में बाहं डाले मटकते हुए चलें
चिकित्सक
रुको रुको यमदूत
लेने आए तुम हो जिसको
बुला रखा है उसने चिकित्सक
लड़ना पड़ेगा उससे तुमको
हरा उसे न पाओ जब तक
मुझे आशंका नहीं
सावित्री चिकित्सक थी
इस बात का पूर्ण विश्वास है
तभी तो वह यमराज से लड़ी
सत्यवान की जान के पीछे पड़ी
छीन न लाई जब तक
लौटी नहीं तब तक
चलिए करते हैं प्रण
हम भी डॉ सावित्री बनने का
प्राण मरीज का वापस लाने तक लड़ने का
उसी राह पर बेखटक निरंतर चलने का
ललकार मृत्यु से रुको-रुको कहने का
हम खड़े चिकित्सक
सामने जब तक
सुन मित्र चिकित्सक! मेरे भाई
तन बीमार मन दूषित है
जन अकुलाए जीवन दूषित है
पथ दूषित प्रचलन दूषित है
बहुविध फैल रहा संक्रमण
जल-थल-आकाश-
पवन दूषित है
पीड़ा के पहाड़ खड़े हैं
संवेदना के बंद घड़े हैं
हृृदय-हृदय धड़कन दूषित है
पुष्पहीन मधुबन दूषित हैं
सौहार्द और विपणन दूषित
वन और उपवन दूषित है
सुन मित्र चिकित्सक! मेरे भाई
हमें रहना होगा जीवित पल-पल
लड़ना होगा मिटने तक खल-बल
कराना होगा मुक्त धरा-व्योम को
उनसे जिनसे स्वास्थ्यधन दूषित है
डटे रहो मित्र—
सुनो मित्र –
पंडित मुल्ला पोप पुजारी !
विश्वास टूट सकता है
आस्था कदापि नहीं
क्योंकि जगत की
आस्था असीम और अनंत पर है
विश्वास व्यक्ति और सुमंत पर
चाहे प्रसाद में चर्बी मिली हो
अथवा चांदी के सिक्के में कोबाल्ट
चढ़ावा चूहा खाए या चोर
मूर्ति पीतल की हो या सोने की
कोई फर्क नहीं पड़ता
आस्था सनातनी हो
चाहे कलयुगी
गाय पर आस्था
बाबा रामदेव की पतंजलि से
गोमूत्र का फर्श क्लीनर बनवाती है
चरणामृत में गाय का गोबर डलवाती है
यह आस्था ही है जो
चूहों संग एक थाली में
भोजन करवाती है
सांपों को दूध पिलवाती है
जन्नत में हूर दिलवाती है
पाप स्वीकारने पर
यीशु से माफ करवाती है
और कारसेवक से
जूता पॉलिश
कोई कुछ भी कहे
कोई कुछ भी करे
डटे रहो मित्र—
अपने दिव्यांग विश्वास
अंतरव्याप्त आस्था के साथ
यह संतृप्त जगत
तुमको कदापि
होने नहीं देगा
अपदस्थ ।
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डाॅ.एम डी सिंह, गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश