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Lahak Digital > Blog > Literature > डॉ. रामकृष्ण के गीत
Literature

डॉ. रामकृष्ण के गीत

admin
Last updated: 2024/08/19 at 9:26 AM
admin
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14 Min Read
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वस्तियाँ हैं, घर- घरौंदे, घंटियाँ बजतीं
मंदिरों की सीढ़ियों पर चींटियाँ पलतीं।।

खेत हैं ,खलिहान है, चौपाल जमता है
धूप में, नम चाँदनी में मन विरमता है।।
भेट की मस्ती भली आहर हिलोरों में ं
उज्ज्वला रजनी यहाँ सौभाग्य है भरती।।

सहन शीला ललित ग्राम्या गीत मय आँगन
झूलता है शाख -तरु पर सजल शुभ सावन।
मेच की छाया मनोरम मोर का नर्तन
कूकती काकली मृदु स्वर बाँसुरी लगती।।

स्नेह के पन्ने खुले के खुले रहते हैं
अलगनी से टँगे शुक संवाद गढ़ते है।
द्वार का कोई अपरिचित अतिथि हो जाता
शुद्ध चौके में अगिन की चाह जग उठती।।

घुप्प अँधेरा
*********”””
फूटपाथ की दूकानों सा
अनियत क्षणिक बसेरा।
समय खाँच में साँच रहा
कज्जल सा घुप्प अँधेरा।।

पल-पल पर आग्रही भाव के
टोहे जाते ग्राहक।
मोल- जोल के बटखारे से
तुलते रहते नाहक।।
आँखों में तस्वीर उजाले की
है आ कर घेरा।।

आस -पास की चिकनाई में
कडुआपन हँसता है।
मीठे पानी के कूएँ में
दुष्ट साँप रहता है।।
श्रम के आलिसान भवनों में
उलुआ करे बसेरा।।

धमन भट्ठियों में देखा क्या
किसका जलता है तन।
बर्फ सिल्लियों बीच बैठ होता
प्रसन्न किसका मन।।
मगन – मगन मुस्काता
बीन बजाता खूब सपेरा।।

खरी कमाई
***********
जीवन भर की खरी कमाई
खण्ड- खण्ड अनुभूतियाँ।।

डग-मग पाँव बढाना ,गिरना
फिर उठना, चलना।
अटपट बोली में तुतलाकर
सब सच – सच कहना।।
तब तो नहीं पराया कोई
सब केवल गुइयाँ।।

आँगन का घेरा सीमित था
हर पल कुछ प्रतिबंध।
धीरे- धीरे पसरा ओटा
और बढ़े संबंध ।।
आने लगा समझ में अंतर
गगन और भुईयाँ।।

संबंधों के मलयानिल से
प्रखर लहर होने तक
दुर्निवार गतिरोध खण्ड के
शीत कुण्ड होने तक।।
खिले चेहरे घट स्वरूप
कैसे बनते टुइयाँ।।

जो दायित्व बढ़ा आखिर तक
लगा नहीं लघुतर।
उलटे दोष हाथ आए जो
चीख रहे दम भर।।
थकी साँस की प्यास बुझाए
कौन सरित कुइयाँ।।

वया की पीड़ा
************
ताल पत्र से झूल रहा
तिनकों वाला घर सुंदर।
छोटी वया अचिन्त्य देखती
आसमान ऊपर।।

पक्षी कुल की ज्ञानवती
है वास्तु कला विज्ञानी।
आतप, वायु -प्रकोप, शीत
की चले न मनमानी।
ऐसी अभियंता चिड़िया का
वर्तमान भास्वर।।

अच्छा है धरती के रौरव से
सुदूर रहना
अपनी खुशी उदार भाव से
बाँट वसर करना।।
अच्छा है प्रपंचमय
कोलाहल से अलग सफर।।

कभी- कभी मानव का पंजा
ऊपर तक आता है।
उसके भी एकांत चैन को
विक्षत कर जाता है।।
उस निरीह लघु गात जीव को
दे जाता है डर।।

यथा क्रम

*******

दिन भर का जलता कुंदन सा
सूरज सागर में ।
शीतलता संस्पर्श आँजने
थक कर डूब रहा।।

अतल क्षितिज के कोने- कोने
उज्ज्वलता दे दे।
व्योम पंथ के सिद्ध मंत्र को
नयी प्रखरता दे।।
लौटेगा बन स्वर्ण कलश सा
कितना त्रास सहा।।

जगती को सद्यस्क बनाने
शौर्य सृजन करने
पुन: गगन के नील सरोवर में
उछाह भरने।।
पंछी के कलरव को गाने
मन भर खूब कहा।।

सरिताओं में गतिमयता का
मान बिन्दु देकर
थोडे़ चुहल भरे अनुनय से
वाष्प धूम लेकर।।
जल धारा के नम दुकूल पर
थोडी़ दूर बहा।।
******

बहुत भूला -सा भटकता
चल रहा हूँ मैं अकेला।।

कई अपनों के अनुग्रह का
चढ़ा ऋण सिर हमारे,
घोसले तिनके सभी हैं
साक्ष के आखर हमारे
कठिन भावाघात में भी
पल रहा हूँ मैं अकेला।।

पीढ़ियों की चाह को
जीवन समर्पित रहा है पर
संतुलित संवेदना एकान्त पक्षी
मंद लघुतर।
ताप की लौ में अहर्निश
जल रहा हूँ मैं अकेला।।

बर्फ के उठते धुएँ में ं
मैं समाना चाहता हूँ
लोक झंकृति के स्वरों से
फिर नहाना चाहता हूँ।।
बहुत ऊँचे से लुढ़क कर
ढल रहा हूँ मेैं अकेला।।

*******
रद्दी पन्नों के टुकड़ों सा
अनपेक्षित प्रक्षिप्त हुआ।

कहाँ गये बूढ़ी आँखों के
तारों सा प्यारा संवाद।
बात -बात पर चिल्लाता है
आँगन करता है प्रतिवाद।।
कौन सुने सच्चे किस्से
लगता मन ही अभिशप्त हुआ।।

अपने बखरे में तनाव के
अंश अंक भर आये हैंं।
दीवारों पर पौध रेंगनी के
पसरे हरियाये हैं।
ऊपर से आचरण आग की
सीमा तक संतप्त हुआ।।

जिस बारी में रोपे बिरवे
शूल -शूल ही लगे खिले
सबके अपने स्वाभिमान थे
मिलकर भी तो नहीं मिले।।
अब तक का विस्तारित सा चट
क्षण भर में संक्षिप्त हुआ।।

*******
जिनको लगती धूप क्षुब्ध मन
आओ मेरे पास
बहुत भरोसे के प्रपंच में
रोप सकें विश्वास।।

मिट्टी पक कर पत्थर बनती
पत्थर गल कर बालू।
मानवता के बाने में छिप
नकली बने दयालू।।
ऐसे छलियों की छाया से
भला खुला आकाश।।

पोथी के पन्नों के आखर
यंत्र अगर बन सकते,
क्यों न सामने खड़े काल के
आगे हम तन सकते।।
बार-बार करना होगा पर
दम भर अथक प्रयास।। ।।

कभी अँधेरे में चलना हो
ज्योति साथ हो अपने।
ठगे- ठगे से वे रह जाते
जिनके कोरे सपने।।
बुद्धि हमारी सुदृढ़ भुजाएँ
सुख कर हो आभास।।

******
लोग अब अनजान से दिखने लगे।।

जिन अभागे जीव को जीवन दिया,
बडे होने पनपने खिलने दिया ,
शीत आतप वात से रख कर सुरक्षित
काठ से,सुरभित सुभग चंदन किया ।।
घरेलू मेहमान से लगने लगे।।

तर्जनाओं ,वर्जनाओं से‌ गुजर,
उम्र के चढ़ते गये मानक शिखर,
अब जरा सी साँस ढीली हो रही
क्षीण साहस, शक्ति का आखिर सफर।
ढोल से कटु कर्ण सब बजने लगे।।

सोंचता हूँ ग्रंथ के जो चित्र हैं,
वे मनुजता के लिए ही मित्र हैं,
चूक कैसे हो रही संभ्रम भरी,
भटकता सा पुरा- काल चरित्र है।।
पतन का पथ इस तरह सजने लगा।।

******
हवाओं के पंख पर चढ़ कर किधर जाऊँ
लक्ष्य उड़ना नहीं केवल, साधना भी है।।

जिन विरोधी स्वरों ने ताली बजाई है,
विविध व्यंजन स्वाद से थाली सजाई है,
ढिंढोरे के नाद ने देकर मुकुट स्वर्णिम
साख की तस्वीर सुंदर सी बनाई है।।
लक्ष्य देना नहीं केवल, माँगना भी है।।

सामने के जीव सब भोले बेचारे हैं,
वैध भाषा के लिए कब से कुँआरे हैं,
तीर आँखों की पुतलियों में न चुभ जाए,
मुट्ठियों में पारदी पत्थर सँवारे हैं।।
लक्ष्य सुनना नहीं केवल वाँचना भी है।।

पहाडों की जड़ों को देखा किया हमने
कौन कितना दीर्घ है कितने हुए ठिगने,
नदी झरने बाढ की हम क्या करे बातें ं,
देखने में है पराये से मगर अपने।।
लक्ष्य लेना नही केवल, छीनना भी है।।

*******
खबरों की टोकरी उठाये
घूम रहे बेकार।
गलियो, में हैं घूम रहे
सौदागर पैरोकार।।

भार हुए डिग्री -डिप्लोमा
औंर प्रशंसा-पत्र
झोला भर काँधे लटकाये
दिख जाते सर्वत्र।।
बड़े पेंच हैं जहाँ नौकरी
बिकती है साभार।।

योग्य कहीं बैठा झखता है
बौधा प्रज्ञ हुआ है।
अंक गणित का सूत्र वाँचता
जो सर्वज्ञ हुआ है।।
भारी ऊपर के दवाव में
ज्ञानी भी लाचार।।

संविधान का पूजक याचक
बहुत दूर की गोटी।
फेक रहा अपने कुवेर की
मिल जाए धन- पेटी।।
दुर्वासा की कौन करे परवाह
सही व्यापार।।

********
धूप की है चढ़ी त्योरी
होश बादल के उड़े।।

तपिस की संजीदगी के
कई किस्से सुने हैं।
क्रूरता के दंश से
आक्रोश के स्वर तने हैंं।।
धरा जलती तापक्रम के
अंक ऊपर हैं चढ़े।।

छाँह की अवधारणा को
चिढाती है दोपहर।
हाय पाखी, ढोर प्यासे
जिये कैसे सोच कर।
शैत्य का आकार कोई
अब भला कैसे गढ़े।।

अक्षरों की गंध, से
साँसें कहाँ होतीं सहज।
ताल के हँसते हुए भी
म्लान से दिखते जलज।।
दरारों की टीस के आवेग
रहते हैं अड़े ।।

******

स्नान को संस्कार का जल
स्वच्छ होना चाहिए।
और थोड़ी देर तक मन-मैल
धोना चाहिए।।

विचारो कीी पूर्ण शुचिता
आचरण का खुला क्रम।
समन्वित हों कहीं पर भी
रह न जाए स्वल्प भ्रम।।
करुण तरुणाई भली
संवेदना के सुर मिले।
प्रेम रस मेंं यथा संभव
मन डुबोना चाहिए।।

मानवी संकल्प के आखर
उनींदे लग रहे।
बाहरी उद्वेग कोलाहल
अचीन्हे लग रहे।।
भूमि का आधार लेकिन
डगमगा पाये नहीं।
इस तरह के बीज पौष्टिक
और बोना चाहिए।।

बहुत सारे विकारक जो
तत्व बिखरे पड़े हैं।
अनुपयोगी जंग खाये
अधगले या सड़े हैं।
उन्हें निपटा स्वस्थ वातावरण
की हो सर्जना।
हमारा वह स्वर्ण दीपक
नहीं खोना चाहिए।।
******

मैं नहीं जीवन्तता का ह्रास लिखता हूँ।।

द्रोण के संकल्प के सातत्य का चिन्तन
वर्तमान अपेक्ष्य जीवन का वृहत् मंथन।
मुक्त प्रतिरोधी विचारों के सहज संचय
घेरते हैं ,तब कहीं परिहास लिखता हूँ।।

उजाले में हृदय का बंधुत्व जगता है
वेदना की भूमि पर सौहार्द्र उगता है।
कठिन पथ की कुटिलता जब चिढाने लगती
ध्वंस के आक्रोश का आभास लिखता हूँ।।

हार की ,संहार की सब व्यर्थ हैं बातें
कौन थी उपहार की अपकार की रातें।
जो दिशा दे सत पथिक की दृष्टि को सुंदर
उस कथा के चरित का इतिहास लिखता हूँ।।

******
जूही के फूल अनछुए।।
चाँदी सी चाँदनी उतर आई ओटे पर
पूनम की आखें जाने किसको हेरती।
दूर कहीं सूने में सौरभी लजाती सी
कानों में चुपके से स्नेह राग छेड़ती।।
मानो रसवंत तन हुए।।
अंग -अंग चंदन की आत्मा उतर आई
प्राण तंत्र बजने लगे ज्यों वीणा के स्वर
शोभन से मधुवर्षी चित्र – माल नयनों को
परस -परस इतराने लगे मानो हों मधुकर।।
कानन सब मधुवन हुए।।

वासंती राग सी लताओं के आलिंगन
मोद बाँटने में बेसुध से होने लगे।
मृदुला विलासमयी मीठी अभिव्यक्ति मौन
अंतर के भाव मंत्र जैसे कढ़ने लगे।।
पारद से कंचन हुए।।
जूही के फूल अनछुए।।

************
कब तक बैठी रह लेगी यह रात निगोड़ी

झिंगुर के पायल :स्वर में क्या रोना -धोना
सन्नाटा पसरा है सारा कोना: कोना।
नहीं दिखाई देता कोई बस जुगनू भर
नहीं जागती लगती है चातक की जोड़ी।

आसमान के दीए जलते चिढ़ा रहे -से
लगते , थाली में कुछ मोती दिखा रहे -से।
कृष्ण व्याल की काया पसर गयी हो मानो
हवा कहीं बैठी सुस्ताती होगी थोड़ी।।

जीवन का संदर्भ रागमय हो सकता है
अतर की पीड़ा का अनुभव खो सकता है।
नव विहान के अंकुर आ जाने वाले हों
समझा जाए भले लगे दूना कोड़ी।।

******
दफ्तर की छीना- झपटी- सा मौसम है बरसात का
नहीं किसी को लेना देना है भावी आघात का।।
बड़े मजे में ठेले वाले ठेल रहे थोड़ा जीवन
कुछ लाचारी में कुछ हसते -ऐसे ही चलते बेमन।
सडकों पर भी डर रहता बदमाशों के उत्पात का ।।
अबकी धान फेंक आया है माली टोले का सुन्दर
सोंचा आहर मे उमढ़ेग सागर जैसी खुब लहर
वर्षा के नक्षत्र चुक रहे समय बूंँद-संपात का।।
आहर के गेड़े पर बैठा हरखू सोच रहा इस काल
बादल की आना- कानी से भूजल भी तो गया पताल।।
लगता शहर चला जाउँ कुछ तो जुगाड़ हो भात का।।

******

ढूँढ रहा हूँ अपने घर में ही अपना घर।

ईंटों की दीवारों से ,छत से, आँगन से,
दरवाजे, खिड़कियों, गवाक्षों के आनन से।
मेरे श्रम का घरनामा जो यहाँ उगा था
दवा-दवा- सा ही कोने में हो अपना स्वर।।

आपना सब कर्तव्य बोध है जाग्रत रहता
संधि, समन्वय की धारा है गढ़ता रहता ।
भाषा का संदर्भ टूटने जैसा लगता
संवादों में खूब उछलता शब्दिक प्रस्तर।।

अनजाना- सा भूला -भूला- सा यह जीवन
एक कथा गढ़ रहा नयी चौखट पर उन्मन।
वर्तमान ही कहीं न बहुरे कल संभव है
कुछ अच्छा हो, शेष काल बन सके न अनुचर।।
——

गया, बिहार

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